लखनऊ में पत्रकारों का सड़क पर उबाल, सत्ता संरक्षित अपराध और हमले के खिलाफ जोरदार विरोध
लखनऊ (आरएनआई)। उत्तर प्रदेश में अपराधियों का दबदबा और सत्ता संरक्षित गुंडों की बढ़ती मनमानी अब पत्रकारों के सब्र से परे हो गई है। लंबे समय से मेन स्ट्रीम मीडिया पर यह आरोप लगता रहा है कि वह दबाव में सच दबा देता है, लेकिन जब लखनऊ के ही फोटो पत्रकार राजन पर घर से बुलाकर जानलेवा हमला हुआ तो मामला सड़क पर आ गया। चार दिन तक पुलिस की निष्क्रियता और कमजोर धाराओं में कार्रवाई से नाराज़ पत्रकारों ने आखिरकार सड़कों पर उतर कर राजभवन तक मार्च निकाला और शासन–प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया।
पुलिस ने राजन पर हमले में एक आरोपी सोनकर नामक व्यक्ति को उठाया, लेकिन गंभीर आरोपों और जानलेवा हमले के बावजूद हल्की धाराओं में मामला दर्ज करने से नाराज़गी और बढ़ गई। पत्रकारों ने इसे सत्ता संरक्षण में अपराध को बचाने की कोशिश बताते हुए खुलकर कहा कि पुलिस की चाल ऐसी दिखाई दे रही है मानो शासन ने उसे लकवाग्रस्त घोषित कर दिया हो। अपराधी हवा में उड़ रहे हैं जबकि पुलिस जमीन में धंसी पड़ी है।
लखनऊ के पत्रकारों ने सोशल मीडिया और समूहों में खुलकर लिखा कि यह हमला किसी पत्रकार पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के चेहरे पर था, लेकिन सिस्टम ने उसी चेहरे पर मास्क लगाकर खुद को अंधा बना लिया। हजरतगंज से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक पत्रकारों की आवाज गूंजी—“बस! अब बहुत हो गया!” गांधी प्रतिमा के पास जमा हुए पत्रकारों ने साफ कहा कि अपराधियों को छिपाया जा रहा है, उनके पीछे कोई सामान्य ताकत नहीं बल्कि सत्ता की छाया खड़ी है।
राजभवन चौराहे पर बैरिकेड लगाए गए, लेकिन पत्रकारों ने साफ कर दिया कि सड़कें रोकी जा सकती हैं, आंदोलन नहीं। देर से ही सही अफसर मौके पर पहुंचे और जल्द कार्रवाई का भरोसा दिया, लेकिन पत्रकारों ने सवाल उठाया—“जल्द का मतलब कब?” चार दिन, चार महीने या तब जब पूरा प्रदेश सड़कों पर उतर आए?
उत्तर प्रदेश में अपराध की स्थिति पर पत्रकारों ने एनसीआरबी के आंकड़े भी सामने रखे, जिनके अनुसार हत्या के मामलों में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है और महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक मामले भी यहीं दर्ज हुए। इसके बावजूद मीडिया का बड़ा हिस्सा बुल्डोजर की कहानियाँ और राजनीतिक गीत गाता रहा, जबकि जमीन पर हालात बिगड़ते चले गए।
‘कमेटी अगेंस्ट असॉल्ट ऑन जर्नलिस्ट्स’ की रिपोर्ट बताती है कि 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक उत्तर प्रदेश में 48 पत्रकारों पर शारीरिक हमले हुए और 66 के खिलाफ मुकदमे दर्ज या गिरफ्तारी की कार्रवाई हुई। इनमें से 78% मामले महामारी के दौरान 2020 और 2021 में दर्ज किए गए। इसके बावजूद पत्रकार लंबे समय तक चुप रहे, लेकिन लखनऊ में राजन पर हुए हमले ने पत्रकारिता समुदाय को सड़क पर उतरने पर मजबूर कर दिया।
अब आवाज स्पष्ट है—यदि अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं हुई और सत्ता व पुलिस की निष्क्रियता जारी रही तो यह आंदोलन लखनऊ की सड़कों से निकलकर प्रदेशभर में फैल जाएगा। पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि अब न वे टूटेंगे, न रुकेंगे और न ही इस बार खामोश बैठेंगे।
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