यूपी में 52 ब्राह्मण विधायकों की बंद कमरे में बैठक, क्या बढ़ेगी ‘पंडित सियासत’ से सत्ता की टेंशन?

Dec 24, 2025 - 15:38
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यूपी में 52 ब्राह्मण विधायकों की बंद कमरे में बैठक, क्या बढ़ेगी ‘पंडित सियासत’ से सत्ता की टेंशन?

लखनऊ (आरएनआई)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातीय समीकरणों की हलचल तेज हो गई है। 23 दिसंबर की शाम लखनऊ में हुई एक खास बैठक ने सत्ता के गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। कुशीनगर से विधायक पीएन पाठक के आवास पर अलग-अलग दलों के करीब 52 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी डिनर के बहाने एकत्र हुए। इस बैठक में बीजेपी के साथ-साथ विपक्षी दलों के ब्राह्मण नेता भी मौजूद थे, जिससे इसके सियासी मायने और गहरे हो गए हैं।

शीतकालीन सत्र के बीच अचानक इतनी बड़ी संख्या में एक ही सामाजिक वर्ग के विधायकों का जुटना सामान्य घटना नहीं मानी जा रही। इससे पहले मॉनसून सत्र में क्षत्रिय विधायकों की ‘कुटुंब बैठक’ भी काफी सुर्खियों में रही थी। अब ब्राह्मण विधायकों का एक साथ आना इस ओर इशारा कर रहा है कि अपनी राजनीतिक ताकत और सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाने की कवायद शुरू हो चुकी है।

सूत्रों के मुताबिक सत्तारूढ़ दल के भीतर कुछ ब्राह्मण विधायक खुद को संगठन और सरकार में नजरअंदाज महसूस कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनकी राजनीतिक और सामाजिक हैसियत के अनुरूप उन्हें वह महत्व नहीं मिल रहा, जिसके वे हकदार हैं। यही असंतोष उन्हें एक मंच पर लाने की बड़ी वजह माना जा रहा है, हालांकि कोई भी नेता इसे खुलकर स्वीकार नहीं कर रहा।

मिर्जापुर नगर से भाजपा विधायक रत्नाकर मिश्रा ने इस बैठक को केवल एक चाय-पार्टी और पारिवारिक मिलन बताते हुए किसी भी तरह की गुटबाजी से इनकार किया। उन्होंने कहा कि सभी लोग साथ बैठे, खाया-पिया और समाज में संस्कारों को लेकर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर उन्होंने पूरा भरोसा जताया और कहा कि अगला चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा।

वहीं बैठक में शामिल भाजपा विधायक अनिल त्रिपाठी ने बताया कि यह सहभोज करीब चार से पांच घंटे तक चला, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के 40 से ज्यादा विधायक मौजूद थे। उन्होंने कहा कि चिंता सरकार से नहीं बल्कि समाज के कुछ वर्गों से है, जहां ब्राह्मणों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक यह अपमानजनक रवैया अब बर्दाश्त से बाहर हो गया है और यही भावना इस तरह के मिलन की वजह बनी।

भले ही नेता इसे सामाजिक मेलजोल बताएं, लेकिन जानकार मानते हैं कि 2026 में पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति हो सकती है। ब्राह्मण समाज की एकजुटता दिखाकर सत्ता और विपक्ष दोनों पर दबाव बनाने की यह कोशिश आगे चलकर यूपी की सियासत में नई करवट ला सकती है। यही वजह है कि लखनऊ की यह बैठक अब दिल्ली तक चर्चा का विषय बन चुकी है।

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