फर्जीवाड़े पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पूछा— धोखाधड़ी साबित होने पर भी क्यों मिले व्यक्तिगत सुनवाई का मौका?

Dec 10, 2025 - 11:31
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फर्जीवाड़े पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पूछा— धोखाधड़ी साबित होने पर भी क्यों मिले व्यक्तिगत सुनवाई का मौका?

नई दिल्ली (आरएनआई)। बैंक खातों में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद भी खाताधारकों को व्यक्तिगत सुनवाई का मौका देने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि 2017 में आरबीआई के निर्देशों के अनुसार उचित जांच के बाद फ्रॉड घोषित खातों को फिर अलग से सुनवाई का अवसर देने की क्या आवश्यकता है?

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ भारतीय स्टेट बैंक की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें खाताधारकों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत व्यक्तिगत सुनवाई देने को कहा गया था।

पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर से सवाल किया कि जब बैंक ने जांच के बाद कारण बताओ नोटिस जारी कर लिखित जवाब देने का अवसर दिया, तो फिर मौखिक सुनवाई की आवश्यकता कैसे उचित ठहराई जा सकती है?

बैंकिंग धोखाधड़ी के आंकड़े चौंकाने वाले

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरबीआई की 2024-25 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया—

2022-23: 13,494 धोखाधड़ी, ₹18,981 करोड़

2023-24: 36,060 धोखाधड़ी, ₹12,230 करोड़

2024-25: 23,953 धोखाधड़ी, ₹36,014 करोड़

मेहता ने दलील दी कि व्यक्तिगत सुनवाई की बाध्यता बैंकों की नियामक व्यवस्था और अखंडता को नुकसान पहुंचाएगी, जबकि आरोपी को लिखित जवाब देने का पूरा अधिकार मिल चुका होता है।

ग्रेच्युटी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
एक अन्य फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि कोई भी कर्मचारी जिसने कम से कम पांच वर्ष की सेवा पूरी की है, वह इस्तीफा देने पर भी ग्रेच्युटी पाने का हकदार है।

दिल्ली परिवहन निगम के एक पूर्व कर्मचारी के मामले में अदालत ने कहा कि— “चूंकि डीटीसी को ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 से छूट नहीं दी गई है, इसलिए कर्मचारी के कानूनी उत्तराधिकारी ग्रेच्युटी पाने के हकदार हैं।”

मुकदमेबाजी कम करने पर जोर: अनावश्यक रूप से केस हाईकोर्ट भेजने पर नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामलों को अनावश्यक रूप से फिर से हाईकोर्ट भेजने से मुकदमेबाजी बढ़ जाती है, जबकि उद्देश्य इसे कम करना होना चाहिए। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि— “प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत महत्वपूर्ण है, लेकिन हर मामले में पुनः सुनवाई के लिए भेजना उचित नहीं है।”

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