निज़ हित के लिए पत्रकारिता दिवस पर सजती दुकानें, और वो जूनियर जो सीनियर का सम्मान नहीं करते
(गोपाल चतुर्वेदी)
उत्तर प्रदेश (आरएनआई) एक समय था जब पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। फिर वह पेशा बन गई। अब वह "पैकेजिंग" बन गई है – कंटेंट बाद में आता है, सेटअप पहले तैयार होता है। साल में एक दिन आता है जब सब लोग एक सुर में "पत्रकारिता दिवस" चिल्लाते हैं, जैसे वो किसी एंकर का स्लोगन हो – दमदार, तेज़ और पूरी तरह प्रायोजित।
अब देखिए न, पत्रकारिता दिवस आते ही खबरियों में हलचल मच जाती है। चायवाले से लेकर चैनल के मालिक तक सब तैयारियों में लग जाते हैं – "भाई, पोस्टर लगा देना", "लड्डू किस दुकान से लेंगे?", "मुख्य अतिथि कौन होगा? किसी एक्टर को बुला लें, किसी कलेक्टर को बुला लें,TRP भी आएगी।" एकाध पुराने पत्रकार को भी बुला लिया जाता है, बशर्ते वो बोलने से ज़्यादा चुप रह सके।
इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य होता है – "ब्रांडिंग" पत्रकारिता का नहीं, पत्रकार के नाम पर खुद का। वहाँ पत्रकारिता पर चर्चा नहीं होती, वहाँ इस बात पर चर्चा होती है कि सेल्फी प्वाइंट कहाँ लगाया जाए ताकि वी आई पी की बाइट लेते वक़्त बगल में थोबड़ा चमके।
और इन सब के बीच सबसे रोचक पात्र होता है – नया पत्रकार, जिसे हाल ही में इंस्टाग्राम रील्स से निकालकर न्यूज़ की दुनियां में डाला गया है। जिसने मीडिया की डिग्री भले ही ली हो, पर गुरु का सम्मान देना नहीं सीखा। जिसे लगता है कि "सीनियर" एक पुराना ऐप है जिसे अपडेट करने की ज़रूरत नहीं।
अब सवाल उठता है – जो जूनियर अपने सीनियर को गुरु मानते ही नहीं, वो खुद कैसे सम्मान के पात्र बनेंगे? जवाब सीधा है – बनेंगे ही नहीं। क्योंकि पत्रकारिता कोई गूगल से डाउनलोड की गई चीज़ तो हैँ नहीं, ये वो अनुभव है जो धूल-धक्कड़ खाते हुए, धमकी और विभिन्न संघर्ष झेलते हुए कमाया जाता है। लेकिन अब तो "मैदान में जाओ" कहना आउटडेटेड हो गया है। आजकल पत्रकारों की ‘फील्ड’ का मतलब कुछ और है पत्रकारिता दिवस पर जो "सम्मान समारोह" होते हैं, वे किसी कॉमेडी शो से कम नहीं। कोई कैमरे के सामने दो बार खड़ा हो गया, एक viral विडियो बना दी – बस हो गया नाम। वहीं कोने में बैठा वो बुज़ुर्ग पत्रकार, जिसने तमाम कष्ट झेले जिसकी रिपोर्टिंग से भ्रष्टाचार उजागर हुआ हो – उसे कोई जानता भी नहीं। क्योंकि उसकी सबसे बड़ी कमी यह है – उसके पास न रिंग लाइट है, न रेचेल मेहंदी।
पत्रकारिता अब ‘कवर स्टोरी’ नहीं करती, अब वह खुद की ‘स्टोरी कवर’ करती है – सुंदर बैकग्राउंड के साथ। पहले रिपोर्टर सच्चाई की खोज में निकलता था, अब लोकेशन की तलाश में। पहले न्यूज़ का स्रोत खेत, खलिहान, पंचायत हुआ करता था; अब कुछ और... पत्रकारिता दिवस मनाने में कोई बुराई नहीं। पर सवाल ये है – मना किसलिए रहे हैं? क्या खुद को याद दिलाने के लिए कि हम कभी जनता की आवाज़ थे? या फिर इसलिए कि साल में एक दिन थोड़ा ‘खुद का प्रचार’ भी हो जाए?
और दुकानों की बात करें तो, अब पत्रकारिता की दुकानें सालभर चलती हैं – कोई निज़ स्वार्थ से राजनीतिक दुकान चला रहा है, कोई कॉरपोरेट के पैसे पर। पत्रकारिता अब चौथा स्तंभ नहीं रही, अब वह "PR एजेंसी" बन गई है – पैसे दो, खबर लो।
तो हे पत्रकारिता दिवस! तू आ तो गया, पर बता – क्या हम अब भी तेरे लायक हैं?
और हे जूनियर पत्रकारों, जो सीनियर को नमस्ते करना भूल चुके हो, याद रखो – बिना जड़ों के पेड़ खड़ा नहीं रह सकता। और बिना गुरु के ज्ञान शोभा नहीं देता, चाहे कितने ही वायरल वीडियो बना लो।
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