जब भीड़तंत्र नदी-नालों पर चढ़ बैठा: अतिक्रमण को अधिकार और बाढ़ को दुर्घटना कहने वालों की दास्तां
गुना (आरएनआई) नदी नालों की हत्या कर उनकी छाती पर अतिक्रमण कर मकान बनाने वालों का यदि नुकसान हुआ है तो मेरे मन में उनके प्रति कोई संवेदना नहीं है। वो मुझे जी भर के गालियां दे सकते हैं। मेरी संवेदनाएं सिर्फ उन निर्दोषों के प्रति हैं जिनका बाढ़ के कारण बेवजह ही नुकसान हुआ। ऐसे लोगों के नुकसान के पाई पाई की भरपाई होना चाहिए। प्रशासन और सरकार दोनों को ही उनकी सुध लेना चाहिए।
गुना नगर में इस वर्षाकाल में 5 जून और 29 जुलाई को दो बार बाढ़ आ चुकी। 29 जुलाई को नाग पंचमी के दिन आई बाढ़ ने तो सारे ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ दिए। कई घरों में पानी घुसा। गृहस्थी तबाह हुई और सैकड़ों घरों में पानी से करोड़ों का नुकसान हो गया। बाढ़ के प्रमुख कारणों में से पहला कारण अप्रत्याशित रूप से एक ही दिन में 13 इंच वर्षा होना है। दूसरा कारण अतिवर्षा से गोपालपुरा तालाब के फूटने पर होने वाली तबाही रोकने के लिए अल्प समय में उसकी बेस्ट बियर के हिस्से को तोड़ना, ये दो कारण तो हैं ही।
तीसरा और बहुत बड़ा कारण है शहर के प्राकृतिक नदी नालों पर तथा नगर पालिका आदि द्वारा जल निकासी के लिए मानव निर्मित ड्रेनेज सिस्टम पर बेतहाशा अतिक्रमण होना और उनमें गाद भर जाने से जल बहाव क्षेत्र का बाधित होना। यदि जलबहाव क्षेत्र पुरानी स्थिति में अतिक्रमण मुक्त, बाधारहित और खुला रहता तो बाढ़ से इतनी तबाही नहीं मचती।
लोकतंत्र सॉरी #भीड़तंत्र में वोट और वोटर का बड़ा महत्व है। वोटर कैसे अपने बने, इसके लिए कई तरह के समझौते किए जाते हैं। फिर वह समझौते नियमविरुद्ध हों, नीतिविरुद्ध हों, कानूनविरुद्ध हों या लोकहित के प्रतिकूल क्यों न हों। इसलिए अतिक्रमण कोई हटा पाएगा, भीड़तंत्र में मुश्किल दिख रहा है।
भीडतंत्र का फायदा उठाकर नदी नालों पर कब्जा जमाए अतिक्रमणकारी कल से मांगें करने लगें कि :-
1. नदी नालों के सभी अतिक्रमण वैध किए जाएं। हाई फ्लड लेबल से एक मीटर ऊंचाई तक हमारे मकान की वर्तमान ऊंचाई बढ़ाने का खर्चा शासन वहन करे। ताकि हम उसके ऊपर मकान निर्माण कर सकें जिससे हमारी गृहस्थी का सामान बाढ़ आने पर न डूबे।
2. वर्षाकाल से पूर्व नाले किनारे डूब क्षेत्र के लोगों को निःशुल्क लाइफ सेविंग जैकेट और किट प्रदान की जाए। स्कूलों में वर्षाकाल में बच्चों की ड्रेस में लाइफ सेविंग किट अनिवार्य की जाए ताकि अचानक बाढ़ आने की दशा में डूबने का खतरा न हो।
3. बाढ़ प्रभावित और डूब क्षेत्र के प्रत्येक परिवार के दो दो युवा सदस्यों को तैराकी का निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए, ताकि बाढ़ आने पर रेस्क्यू टीम के विलंब से आने की दशा में अपने परिवार के बच्चों, बीमारों, बुजुर्गों को खुद ही बचा सकें।
4. नदी नाले किनारे मकानों की रजिस्ट्री के वक्त प्लॉट या मकान खरीदने वाले व्यक्ति पर किसी मान्यता प्राप्त तैराकी प्रशिक्षण संस्थान से तैराकी का डिप्लोमा होना अनिवार्य किया जाए।
5. बारिश के मौसम में प्रत्येक नदी नाले के आसपास नावों की व्यवस्था की जाए। जिनसे आवश्यकता पड़ने पर हम अतिक्रमणकारी अपने घरों की ऊपरी मंजिल पर भोजन के पैकेट, राहत सामग्री आदि मंगा सकें।
6. शहर के आसपास के तालाबों से बाढ़ का खतरा है इसलिए इन तालाबों को खत्म कर उनकी जमीन में हमारे बेरोजगार बच्चों को खेती के पट्टे दिए जाएं, जिससे हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
7. पारिवारिक जरूरतें बढ़ने पर, बेटों की शादी के बाद बहुएं आने पर हमें अपने मकानों में अतिरिक्त कमरों का निर्माण करने की अनुमति प्रदान की जाए। ये निर्माण भी नदी नालों में बेकार पड़ी हमारे हक अधिकार की भूमि पर किया जाएगा।
तो कोई आश्चर्य मत समझना। इस तरह की मांगे चुनाव के वक्त की जाएं और इन मांगों को कोई भी दल मान ले, तो भी कोई अचरज की बात नहीं होगी। होड़ में हो सकता है कि नदी नालों में स्लैब डालकर शासकीय आवास बनाकर देने की घोषणा भी कर दी जाए।
जब लोक की गलत मांगों को भी तंत्र मानने लगे, या गलत मांग करने वालों को रोके नहीं तो लोकतंत्र, भीड़तंत्र बन जाता है और भीड़तंत्र में कुछ भी असंभव नहीं होता। अब किसी को ये कड़वा सच बुरा लगे तो सौ बार लग जाए। जय राम जी की।
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