जनता पर बोझ, सत्ताधारियों की विलासिता : यूपी सरकार का दैनिक खर्च 20 हजार करोड़
सुधीर शुक्ला
वृन्दावन (आरएनआई)। देशभर में जनता छोटी–छोटी सुविधाओं के लिए जूझ रही है — जैसे सफाई, ट्रैफिक व्यवस्था, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का सालाना बजट 7.3 लाख करोड़ (2025-26) है, यानी औसतन 20,000 करोड़ रुपये प्रतिदिन खर्च होते हैं। यह राशि अगर गाँवों की मूलभूत ज़रूरतों पर लगे, तो सैकड़ों गाँवों का कायाकल्प संभव है।
पर हकीकत इसके उलट है। बड़ी रकम वेतन, पेंशन, भत्ते, बंगले, गाड़ियों और सुरक्षा तंत्र पर खर्च होती है। जनता से उगाही होती है ट्रैफिक फाइन, बिजली–पानी के बिल और टैक्स के नाम पर। हेलमेट, सीट बेल्ट जैसे नियम आम नागरिकों पर सख्ती से लागू, पर VIP गाड़ियों और नेताओं पर अक्सर ढील।
वृंदावन–मथुरा जैसे पवित्र नगरों में सुरक्षा और यातायात प्रबंधन की जगह "उगाही" का ज़रिया बन गया है। खादर क्षेत्र में अवैध प्लॉटिंग और रजिस्ट्री खुलेआम होती है, क्योंकि हिस्सा ऊपर तक पहुँचता है। नदियों–जंगलों की भूमि नेताओं और माफिया की मिलीभगत से औने–पौने दाम पर बेची जाती है।
जनता पर टैक्स न चुकाने पर भारी पेनाल्टी और नोटिस भेजे जाते हैं। छोटे बिल पर कनेक्शन काटा जाता है। पर सत्ता वर्ग का जीवन ऐश्वर्य और प्रोटोकॉल से भरा रहता है। मंत्रियों के बंगले, सुरक्षा काफ़िले और सरकारी तामझाम पर जनता का टैक्स बेहिसाब खर्च होता है।
आपदा राहत का बजट भी अक्सर घोटालों में उलझता है। गंगा–यमुना प्रदूषण रोकने के नाम पर अरबों खर्च हुए, परिणाम शून्य। बाढ़, सूखा, भूस्खलन और महामारी में सैकड़ों लोग मरते हैं, मगर सत्ता वर्ग की संवेदनाएँ कठोर बनी रहती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारें टैक्स राहत ऐसे देती हैं, जैसे अपनी संपत्ति बेचकर दान कर रही हों, जबकि असल में जनता का ही पैसा जनता को "अनुग्रह" की तरह लौटाया जाता है। असली समस्या यह है कि कानून–व्यवस्था के नाम पर आम नागरिक को नियंत्रित किया जाता है, मगर प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार पर आंख मूंद ली जाती है।
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