गुना: सत्ता का तमाशा और आम आदमी की टूटती उम्मीदें
गुना (आरएनआई) मध्यप्रदेश का गुना जिला कभी राजनीतिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता के लिए जाना जाता था, पर आज हालात ऐसे हैं कि यहां का आम आदमी खुद को राजनीतिक रूप से अनाथ महसूस करने पर मजबूर है। जिस प्रशासन और सरकार का मुख्य कार्य जनहित और नागरिकों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति होना चाहिए, वहां हर जिम्मेदारी का केंद्रबिंदु अब सिर्फ सत्ता का उपभोग और निजी स्वार्थ बनकर रह गया है।
बरसात के इन दिनों में गुना की सड़कों पर नजर डालिए—गली-मोहल्लों की स्थिति तो छोड़ दीजिए, हाईवे तक जानलेवा गड्ढों में तब्दील हो चुके हैं। अतिक्रमण ने नालों का मुंह बंद कर दिया है। हर साल बाढ़ जैसे हालात बनते हैं, पर नगर पालिका सोई रहती है। नालों की सफाई कितने सालों से नहीं हुई, इसका कोई हिसाब प्रशासन के पास नहीं है।
शिक्षा का हाल देखिए—सरकारी स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। सरकारी शिक्षा का स्तर इतना गिर चुका है कि गरीब-मध्यमवर्गीय लोग भी कर्ज लेकर बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में भेजने को मजबूर हैं। शिक्षा अब सेवा नहीं, धंधा बन चुकी है। प्राइवेट स्कूल मनमानी फीस वसूलते हैं, कमीशनखोरी और लालच की खुली दुकाने चला रहे हैं, मगर प्रशासन की आंखें मूंदे हुए हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की दशा और भी शर्मनाक है। सरकारी अस्पताल नाम के लिए हैं—डॉक्टर अपनी ड्यूटी कम, निजी क्लीनिक की कमाई में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। हर डॉक्टर की अपनी पैथोलॉजी, अपनी लैब। जो जांच 200 रुपये में होनी चाहिए, वही 1000 रुपये में कराई जाती है। मरीजों से जानवरों जैसा व्यवहार होता है। कोई सुनने वाला नहीं है।
रोजगार का संकट विकराल होता जा रहा है। पढ़े-लिखे युवा हाथ में डिग्रियां लेकर बेरोजगारी की कतार में खड़े हैं। व्यापारी भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं, किसान नकली खाद-बीज की मार झेल रहे हैं। सरकारी अनाज, खाद, बीज तक में घोटाले खुलेआम हो रहे हैं।
अपराध का आलम यह है कि जुआ, शराब, सट्टा, मादक पदार्थों की तस्करी—सब पर सत्ता के संरक्षण का साया है। हां, नवीन एसपी ने कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं, मगर अकेले उनकी कोशिशों से व्यवस्था का सड़ा हुआ ढांचा सुधरने वाला नहीं।
महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों पर बिजली बिलों का इतना बोझ डाल दिया गया है कि लोग रात-दिन चिंता में डूबे हैं। एक ओर दलाल, भ्रष्ट लोग सत्ता की छांव में करोड़पति बन रहे हैं, तो दूसरी ओर ईमानदार गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहा है।
आज सवाल यह है—आखिर यह कैसा तंत्र है जो सिर्फ अपने अधिकारों के भोग और निजी फायदे के लिए काम करता है? क्या जिला प्रशासन और सरकार अपने संवैधानिक कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे या यूं ही जनता के भरोसे का मजाक उड़ाते रहेंगे?
यह व्यवस्था तब तक नहीं सुधरेगी, जब तक आम आदमी सवाल पूछना नहीं सीखेगा। जब तक जनता यह तय नहीं करेगी कि उसके वोट और उसके टैक्स का पैसा किसके ऐशोआराम के लिए खर्च किया जा रहा है।
कभी यह जिला मेहनतकश किसानों, व्यापारियों और पढ़े-लिखे युवाओं के सपनों का केंद्र था। आज हालात यह हैं कि हर तबका निराशा और असहायता की दलदल में धंसा है। यह हालात इत्तफाक से नहीं बने—यह उस बेशर्म मिलीभगत का नतीजा हैं, जहां सत्ता और भ्रष्टाचार की सांठगांठ ने आम जनता को पैरों तले कुचल दिया है।
सवाल यह नहीं है कि हम कब तक चुप रहेंगे। असली सवाल यह है कि अगर अब भी हम नहीं जागे, तो कब जागेंगे?
गुना के लोग बहुत सहनशील हैं—लेकिन कोई भी समाज अनंतकाल तक पिसने के लिए पैदा नहीं हुआ। वक्त आ गया है कि प्रशासन से, सरकार से, अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे जाएं—हमारे हक की सड़कें, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय आखिर कहां हैं?
अगर इस सवाल को हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी माने, तभी बदलाव की कोई शुरुआत होगी। वरना आने वाली पीढ़ियां हम पर यही इल्जाम लगाएंगी कि हमने अपने बच्चों को भ्रष्टाचार और लूट की विरासत देकर सिर झुका लिया।
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