गुना: मामूली विवाद पर मेडिकल स्टोर बंद, दवाइयों के लिए भटके मरीज
गुना (आरएनआई) एक मामूली विवाद दुकान के सामने निर्माण सामग्री रखे जाने को लेकर मेडिकल एसोसिएशन ने बिना सूचना दिए शहर की मेडिकल दुकानें बंद कर दीं।
नतीजा यह हुआ कि जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचे मरीज अपने हाथों में पर्ची लिए दवाइयों के लिए भटकते रहे हैं। किसी को हृदय रोग की दवा चाहिए थी, किसी को ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने की, किसी को छोटे बच्चों के लिए जीवन रक्षक सिरप। लेकिन सब बेबस और परेशान नजर आए।
मेडिकल स्टोर महज़ व्यापार का साधन नहीं हैं। ये जीवनदायिनी सेवाओं का हिस्सा हैं। डॉक्टर इलाज का रास्ता दिखाते हैं, परंतु उपचार तभी संभव है जब मरीज को समय पर दवा मिले। दवा न मिलने का मतलब है मरीज को संकट में धकेलना। यही कारण है कि दवाइयों की दुकानें "अति आवश्यक सेवाओं" की श्रेणी में आती हैं। ओर सरकार और ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के नियम से बंधी हुई हैं,जो नीति से चलती हैं।
मेडिकल एसोसिएशन का उद्देश्य सिर्फ अपने सदस्यों के हित की रक्षा करना नहीं, बल्कि समाज की सेवा भी है। यदि किसी दुकान के सामने अतिक्रमण हुआ है या कोई भी विवाद है तो उसका समाधान प्रशासन से बातचीत और ज्ञापन के माध्यम से निकाला जा सकता था। यदि प्रशासन कार्रवाई नहीं करता तो चेतावनी के बाद सूचना देकर हड़ताल का रास्ता चुना जा सकता था। लेकिन बिना सूचना अचानक शहर की सभी मेडिकल दुकानें बंद कर देना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना रवैया है, बल्कि यह एक अमानवीय कृत्य भी है।
सोचिए, जिन मरीजों की जिंदगी दवाओं पर टिकी हुई थी, वे अचानक दवा न मिलने के कारण किन हालातों से गुज़रे होंगे..???? एक-एक पल उनके लिए मौत और जिंदगी के बीच की दूरी को बढ़ा रहा होगा। दवा लेने निकले बुजुर्ग, छोटे बच्चों के माता-पिता, गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग— सबके चेहरे पर लाचारी और गुस्सा साफ झलक रहा था । अगर किसी मरीज की जान इस बंद के कारण चली जाती, तो उसका जिम्मेदार कौन होता..??? अध्यक्ष, संगठन, ठेकेदार या पूरा सिस्टम..??? व्यक्तिगत विवाद को लेकर सामूहिक रूप से जनता को परेशानी में डालना किस हद तक न्यायसंगत है?
संगठन और उनके पदाधिकारियों को यह समझना चाहिए कि नेतृत्व जिम्मेदारी से आता है, न कि मनमानी से। मेडिकल स्टोर जीवन की डोर हैं, इन्हें कभी भी व्यक्तिगत विवाद का हथियार नहीं बनाया जा सकता।
इस तरह की घटनाएं जनता के विश्वास को तोड़ती हैं और मेडिकल व्यवसाय की गरिमा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती हैं।
यह अति आवश्यक है कि केमिस्ट एसोसिएशन के लोग तुरंत मेडिकल स्टोरों को खोले और जो भी विवाद है उसका प्रशासन के साथ मिल बैठकर समाधान निकाले और अगर वह ऐसा नहीं करते तो प्रशासन को भी चाहिए कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कार्रवाई करे ताकि भविष्य में कोई भी संगठन आमजन को इस तरह की परेशानी में न डाले। समाज की सेवा करने वाला व्यवसाय यदि समाज को ही संकट में डालने लगे, तो फिर ऐसे नेतृत्व और ऐसे फैसलों का विरोध होना आवश्यक है.
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