गुना बाढ़ त्रासदी: नाले पर अतिक्रमण बना विनाश का कारण, डूब क्षेत्र में बसीं पॉश कॉलोनियां भी चपेट में
गुना (आरएनआई) आज गूगल सैटेलाइट मैप पर गोपालपुरा डैम से निकला वह नाला देखा जो भगतसिंह कॉलोनी होते हुए होटल संधू लैंड मार्क, होटल सामरसिंगा के पीछे से, पेट्रोल पंप के बगल से, नानाखेड़ी पुल के नीचे से आगे बढ़ता है। इससे आगे रिलायंस पेट्रोल पंप को छूकर निकलता है। इसी के एक ओर न्यू सिटी कॉलोनी और दूसरी ओर पीतांबरा बिहार कॉलोनी व अन्य कॉलोनियां बस गईं। आगे ये नाला कोल्हूपुरा से गुजरकर गुनिया नदी की ओर बढ़ जाता है।
गोपालपुरा डैम का क्षेत्रफल लगभग 40 हेक्टेयर है। और नानाखेड़ी तक इस नाले की लंबाई करीब पौने दो किमी है। इस दूरी में इस नाले का अस्तित्व कई जगह खत्म हो चुका है। कहीं खेत बन गए हैं तो कहीं इसकी चौड़ाई को नाले किनारों पर दीवार बनाकर मिट्टी भर कर कम करके बसाहट करवा दी गई है। नानाखेड़ी से आगे कोल्हूपुरा होकर गुनिया नदी तक इसकी लम्बाई करीब सवा किमी है। इस क्षेत्र में इसके दोनों किनारों पर इसके किनारों पर सघन बसाहट हो चुकी है।
इस नाले के दोनों ओर की बसाहट ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। कारण कि नाले के बहाव क्षेत्र का फ्री फ्लो बाधित है। वैध अवैध कॉलोनाइजर या भूमाफियाओं ने शुरुआत में इसके किनारों पर सस्ती दरों पर प्लॉट बेचना शुरू किए। बसाहट शुरू हुई तो भेंड़चाल में और लोगों ने प्लॉट खरीदे। इस कारण कीमतें आसमान छूने लगीं। ये कॉलोनियां बाद में पॉश कॉलोनियां कहलाने लगीं। जिनकी हकीकत आज सामने है। पॉश कॉलोनी के इन घरों में बाढ़ का पानी एक एक फुट तक कीचड़ छोड़ गया है।
अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और जल संसाधन विभाग के नियमों की बात करें। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के नियमों के अनुसार, नाले के किनारे 100 मीटर तक का क्षेत्र "नो-डेवलपमेंट ज़ोन" माना जाता है, जहाँ कोई भी निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है। जल संसाधन विभाग, मध्य प्रदेश के नियमों के अनुसार, नाले के किनारे 30 मीटर तक निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है। यह नियम नदियों, तालाबों, नहरों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों पर भी लागू होता है।
लेकिन सभी ने अपनी सुविधा के अनुसार इन नियमों की अनदेखी की। परिणाम सामने है। वो नियम कोई पढ़ना नहीं चाहता जो मन को न भाएं। जो लोग नियम पढ़ लेते हैं वो इन्हें मानते नहीं, कहते हैं जब सबके टूटेंगे तब देखेंगे। कहा जा रहा है कि गोपालपुरा डैम की बेस्टबियर तोड़ने से पहले किसी को बताया नहीं, बताते तो गृहस्थी बचा लेते। तर्क उचित हो सकता है। लेकिन इससे पहले इतिहास में 9 घंटे में 9 इंच बारिश कब हुई थी जो किसी को इस दैवीय प्रकोप का पहले से अंदाजा होता। हुई भी होगी तब नाले किनारों पर बसाहट थी क्या? नहीं थी। यदि डैम ही टूट जाता तो ऐसी तबाही होती कि कई लोग सवाल करने किए शायद बचते ही नहीं। लेकिन जो हुआ बेहद दु:खद है।
महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बाढ़ का पानी तो पटेलनगर, गुलाबगंज, कालापाठा, शिव कॉलोनी, आदर्श कॉलोनी, घोसीपुरा, हनुमान कॉलोनी, राधा कॉलोनी, छाबड़ा कॉलोनी, एमपीईबी, पुरानी गल्ला मंडी, हाट रोड, कर्नलगंज, आसमानी माता मंदिर आदि क्षेत्र के घरों में भी भरा और नुकसान कर गया। ये इलाके गुनिया नदी के आसपास के हैं और वहां तो सिंहवासा डैम नहीं फूटा था।
बाढ़ ने फुलवारी कॉलोनी, पत्रकार कॉलोनी, विंध्याचल कॉलोनी, भुल्लनपुरा, श्रीराम कॉलोनी भुजरिया तालाब के आसपास भी घरों की मयार को छुआ वहां भी कोई डैम नहीं फूटा था। इसी तरह न्यू टेकरी रोड, पवन कॉलोनी, पुरानी छावनी भी बाढ़ प्रभावित रही। वहां भी कोई डैम नहीं तोड़ा गया था। कुछ घंटों में ही भारी बारिश हो जाना और पानी बहने की हर प्राकृतिक और मानव निर्मित संरचना पर अतिक्रमण होना ही इस त्रासदी की वजह और जड़ है।
सवाल वही है कि बाढ़ की समस्या की जड़ "अतिक्रमण" पर कोई बात क्यों नहीं करना चाहता? नदी, नालों, तालाबों के अस्तित्व को मिटाने वालों पर कार्यवाही के लिए कभी कोई चक्काजाम क्यों नहीं करता? दलालों की बातों में उलझकर डूब क्षेत्र की वैध अवैध कॉलोनियों में भू माफिया से प्लॉट लेकर ठगे जा चुके लोग कभी भूमाफिया पर उनके साथ धोखाधड़ी करने की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराते? यदि जल निकासी क्षेत्र में अतिक्रमण न होता तो बाढ़ का पानी उसमें से आसानी से निकलता इससे नुकसान नहीं होता या बहुत कम होता।
तर्क के लिए मान लेते हैं कि इस सिस्टम में सब गलत हैं। किंतु इस तर्क में भी बड़ा सवाल यह कि सबको गलत ठहराने या साबित ही कर देने से क्या हम सही हो सकते हैं? नदी नालों के किनारों और बहाव क्षेत्र में, और ड्रेनेज सिस्टम पर अतिक्रमण किसने किया है? अधिकारों की बात पर बवाल मचाने वाले हम लोग इतने भोले भी तो नहीं हैं कि अपने कर्तव्य और सही गलत का अर्थ न समझते हों।
अभी भी गलतियों को ढांकने का नहीं बल्कि उन्हें सुधारने का समय है। आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएं, विरोध भी हो पर इसके बाद भी सार्थक समाधान नहीं निकला तो सब व्यर्थ है।
भगवान न करे भविष्य में कभी गोपालपुरा, सिंहवासा या भुजरिया में से कोई तालाब दम तोड़े। हमने तो उनका और उनके नदी नालों का गला घोंटने में कोई कसर छोड़ी ही नहीं है। उनका गला घोंटकर भी हम आँखें ही दिखा रहे हैं। और वो बेबस होकर बार बार चीख चीख कर यही कह रहे हैं कि हमें बख्श दो वर्ना जिस दिन हम बेशर्म होकर टूट गए उस दिन तुम अपना अस्तित्व, गृहस्थी, परिजन सबको हमारे कीचड़ में ही तलाशते घूमोगे। उसके बाद सड़कों पर जिंदाबाद मुर्दाबाद करते रहना। अफसरों नेताओं को गरिया लेना, उनके ट्रांसफर करा लेना। विधायक सांसद पार्षद को हरवा जितवा लेना। सड़कों पर जाम लगा लेना। उससे कौन सा आसमान फट जाएगा। जो खो चुके होगे वो तो कभी वापस नहीं आएगा न।
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