कृष्ण जन्माष्टमी: अंधकार से प्रकाश तक का संदेश, हर युग में प्रासंगिक हैं श्रीकृष्ण
सुधीर शुक्ला
वृन्दावन (आरएनआई) | श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन और समाज के लिए गहरा संदेश समेटे हुए है। कृष्ण का जन्म कारागार की अंधेरी रात में हुआ था। यह घटना केवल ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि प्रतीक है उस मानसिक और भावनात्मक बंधन का, जिसमें हर मनुष्य जकड़ा हुआ है। कारागार जहां बंधनों का प्रतीक है, वहीं अंधकार हमारे भीतर के अज्ञान और मोह का द्योतक है। इस अंधकार के बीच कृष्ण का प्राकट्य यह सिखाता है कि हर आत्मा को अपने भीतर से प्रकाश और स्वतंत्रता की ओर बढ़ना चाहिए।
कृष्ण का जीवन एक "लीला" था—सहज, आनंदमय और पूर्ण। उन्होंने सिखाया कि अस्तित्व को उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह सुख हो या दुःख, प्रेम हो या संघर्ष। यही कारण है कि कृष्ण केवल पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि मानव जीवन के गहन रहस्यों के उद्घाटक माने जाते हैं।
आज का युग और महाभारत का प्रसंग
महाभारत की गूंज आज भी सुनाई देती है। जिस प्रकार द्रौपदी की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगा और सत्ता ने मौन धारण कर लिया था, उसी तरह आज भी अन्याय और भ्रष्टाचार के सामने समाज और व्यवस्था कहीं न कहीं चुप दिखाई देती है।
आज का "दुशासन" सत्ता के अहंकार, भ्रष्टाचार और संस्कृति-विरोधी कार्यों में सामने है। "धृतराष्ट्र" और "गांधारी" की तरह ही आज का नेतृत्व कई बार आंखें मूंद लेता है।
ब्रज और संस्कृति की पुकार
जैसे द्रौपदी ने पुकारा था, वैसे ही आज ब्रजवासियों और ब्रजसंस्कृति भी संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जब-जब अधर्म बढ़ा है, तब-तब कृष्ण का प्राकट्य हुआ है। यह प्राकट्य केवल अवतार के रूप में ही नहीं, बल्कि समाज की चेतना, न्यायप्रिय नेतृत्व और धर्म की रक्षा के संकल्प के रूप में भी सामने आता है।
कृष्ण का सतत संदेश
कृष्ण जन्म केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि सतत संदेश है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, उसमें से सत्य और प्रकाश का जन्म अवश्य होगा। आज आवश्यकता है कि हम केवल कृष्ण के पुनरागमन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने भीतर जगाकर अन्याय के विरुद्ध खड़े हों और अपनी संस्कृति तथा आस्था की रक्षा करें।
श्रीकृष्ण केवल अतीत के नायक नहीं, बल्कि हर युग के पथप्रदर्शक हैं। और जब तक अन्याय रहेगा, कृष्ण फिर-फिर आते रहेंगे।
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