आठ साल बाद GST दरों में कटौती – क्या अब सचमुच "एक राष्ट्र, एक टैक्स" का सपना पूरा हुआ?

(शैलेन्द्र बिरानी)

Sep 23, 2025 - 18:09
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आठ साल बाद GST दरों में कटौती – क्या अब सचमुच "एक राष्ट्र, एक टैक्स" का सपना पूरा हुआ?

नई दिल्ली (आरएनआई)  अब GST बचत उत्सव मनाकर लोगों को छला जा रहा हैं | सीधी और सरल बात जीएसटी के नाम पर इतनी वसुली को जनता पर लागू किसने करा | 

"घूँघट की आड़ में टैक्स बरसे"
गुड्स एन्ड सर्विस टैक्स (GST) के कही पहलू को एक राष्ट्र - एक टैक्स की नव नवेली दुल्हन के घूँघट के पीछे छुपाया जा रहा है |

खबर:- जम्मू-कश्मीर को छोड़ पुरे भारत राष्ट्र में 01 जुलाई 2017 से गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) लागु 

भारत में GST लागु हो गया उसकी खबर हमने अखबार में पढ़ी उसके आगे प्रधानमंत्री की फोटो थी, उसके पीछे दो प्रधानमंत्री की फोटो थी उसके दाएं एक और प्रधानमंत्री की फोटो थी उसके बाएँ दो प्रधानमंत्री की फोटो थी अब आप बताओ कुल कितने प्रधानमंत्री थे |

GST की बात करे तो भारत में करीबन 50 से ज्यादा तरह के लागु हो गये जैसा सोशल मीडिया में GST का पूरा अर्थ बताके पोस्ट को प्रसारित किया जा रहा है |

सुनाने को, दिखाने को, कहलाने को तो भारत एक देश है व उसमे एक टैक्स GST लागु हो गया परन्तु कागज़ में (ग्राहक को दिया जाने वाला बिल) आज भी देश को बाँट के रखा है | जहा टैक्स को पुरी दुनिया से हटकर एक दिखाने के बजाय 0, 5, 12, 18, 28 में पहले ही बाँट रखा है था वहाँ फिर CGST, SGST, IGST में बाँट के देश के व्यापारियों को अकाउंटेंट के झाल में फॅसने के लिए दाने फेके गये है |

क्या भारत सरकार यह मानके चलती है कि उनके कर्मचारी इतने सक्षम नहीं है जो महीने के अंत में कुल जमा टैक्स को कैलकुलेटर , मोबाइल , कंप्यूटर  व लैपटॉप  में से किसी भी एक का सहारा लेकर इस रकम को आधा-आधा करके दो भागो में बाँट दे | इसमें कही सरकारी कर्मचारियों के काम की जवाबदेही जानबूझ कर व्यापारियों के सर मढ़ने का खेल तो नहीं | इसके अतिरिक्त अन्य एक और पहलु पर गौर किया जाये तो पहले बिल में वेट व अतिरिक्त वैट लिखना पड़ता था कही इस फॉर्मेट वाले सिस्टम को ही नया कहके करोड़ों रुपयों की सफाई देश के खजाने से तो नहीं कर डाली गई |

संसद में भी भारत के एक झंडे के निचे सभी दल दिन के उजाले को छोड़ रात के अँधेरे में 12 बजे भी एक साथ नहीं आ सके इसलिए राज्यों के नाम पर बाँट के रखना को आश्चर्य नहीं | आज भी रात को आजादी की घोषणा पर कई लोग सत्ता हस्तांतरण का एग्रीमेंट कहते है जो पेपर में चलता है इसलिए IGST को बनाना अवष्यंभावी था |

सरकार की जानकारी, मंत्रियो की समझाईस, अधिकारियो के बटते ज्ञान व चार्टेंट अकाउंटेंट (CA) के लंबे चौड़े समझाईस कार्यक्रमों के बाद अखबारों व टीवी  चेनलो में बड़े-बड़े झंडे गाढ़ने के बाद भी आज तक GST में शुरू से लेकर अंत तक व्यापारी इस कानून का उलंगन करे तो उसकी सजा क्या होगी उसकी पूरी एक साथ लिस्ट सामने आई ही नहीं न किसी सोशल मीडिया के शूरवीर ने पोस्ट करी अर्थात कर्मचारी कानून का डर बता किसी भी गलती पर व्यापारी का सबकुछ उखाड़ के ले जाने के लिए स्वतन्त्र रहेगा |

GST के नाम पर गणित करके चीजों के सस्ता होने का ढोल बजाके ऐलान हो रहा व विज्ञापन चलाये जा रहे है परंतु पीछे से पुराने सर्विस टैक्स की दर से ज्यादा 18% से सभी सेवाओं पर जो टैक्स बढ़ा है उससे लागत के ट्रांसपोर्ट, उतराई-भराई, इंफ्रास्ट्रक्चर, रख-रखाव खर्च, इंटरनेट, बैंक, लाइट बिल, पानी व तमाम जरुरी खर्च महंगे हो गये उसे गोलमाल कर दिया जा रहा है |

प्रत्येक वस्तु पर 10 से  रुपये की बढ़ोतरी को वर्तमान में आम-इंसान सहन कर जायेगा क्योकि उसे टुकड़े में बांटे जाने का पता नहीं चलेगा परंतु 2 - 3 माह बाद जब उसका 100 महीने का बजट गड़बड़ाने लगेगा तब जाकर GST के नये - नये अर्थ सुनने को मिलेंगे वर्तमान में तो यह गब्बर की जगह डराने का काम कर रहा है जो ग्राहक की जेब से ज्यादा पैसा निकलाने का सुख दे रहा है जबकि लेने वाला खुद अगली चौखट पर ग्राहक बनता है |

"तकनिकी तौर पर देखा जाये तो टैक्स स्लैब 4 नहीं 5 हुये, कंप्यूटर आधारित प्रणाली में "टैक्सरहित" कोई ऑप्शन नहीं होता इसलिए 0 (शुन्य) को एक टैक्स स्लैब माना गया है | भविष्य में सारी गणित व सॉफ्टवेयर 5 के आधार पर ही बनेगे | यदि भाषा के आधार पर गलती करी व फैसले को लोग लुभावन बनाने के लिए "टैक्स फ्री" का जुमला इस्तेमाल किया गया तो .......... इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी | इससे मौसम के आधार पर वस्तुओं की कीमत टैक्स से कंट्रोल करने का एक बहुत बड़ा मार्ग सदैव के लिए बंद हो जायेगा | यदि जानकारों ने कोशिश करी तो राजनेता लोग ही सड़क पर कोहराम मचा देगें और पूरी बाज़ार प्रणाली को तहस-नहस कर देंगे |"

हम पेट्रोल डीजल, आयल, शराब व भूमिकर को GST वाली एक राष्ट्र - एक टैक्स की भाषा वाली छतरी के निचे लाने की बात नहीं कर रहे क्योकि यह तो राज्यों का काला-सोना है और छापे और माल की जप्ती तो देश के नाम पर सिर्फ जनता के सोने पर ही पड़ते है |

दूध का जला इंसान भी छाछ को फुक मारके पीता है परन्तु यह तो सरकार है धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहलु रोड पर सिर्फ अपनी-अपनी पोषित राजनैतिक पार्टी की नारेबाजी के लिए है असली में यह सभी बेगाने है | नोटबंदी
के समय नये नोट छाप दिये पर बैंको की ATM मशीनों के अंदर उसकी स्टोर प्लेटो की साईज का ध्यान नहीं रखा व लोगो को कतारों में लगा कहियो को यमलोक पंहुचा दिया | अब भी यही हुआ GST लागु कर दिया लेकिन किसी भी सॉफ्टवेयर कंपनी के पास पुराने को अपडेट करनेवाला सॉफ्टवेयर नहीं है | सरकारी प्रक्रिया की ऑनलाइन अपडेटिंग भी पूरी नहीं हुई | ट्रायल तो जिंदा इंसानो पर होता है यहाँ तो इंसानो की जेबो से पैसा निकालने का मामला है। 

एक देश व एक टैक्स के माध्यम से पुरे राष्ट्र को जोड़ना अच्छी बाँट है परंतु यह सिर्फ आप आदमी से सिर्फ और सिर्फ टैक्स लेने के अतिरिक्त लेने वालो में भी नजर आना चाहिये |

सरकारी अर्थशास्त्रियों को हम यही कहेगे की GST में टैक्स को 28% से बढाकर 60% कर देना चाहिए ताकि देश की जीडीपी दुगुनी हो जाये व देश दुनिया में सबसे बड़ा बन जाये | गरीबी, बेरोजगारी, जनता का मानसिक अवसाद, भुखमरी, जीवनस्तर यह कोई आधार थोड़ी है जिसके तहत देश का विकास घटता व बढ़ता है वह तो सिर्फ नये - नये सिक्को की खनखनाहट से चमकता है |

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