8 साल में 100 करोड़ की संपत्ति! डॉ. एस. के. गौड़ ने आय से अधिक संपत्ति मामले में सबको पछाड़ा

Jun 27, 2025 - 18:25
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8 साल में 100 करोड़ की संपत्ति! डॉ. एस. के. गौड़ ने आय से अधिक संपत्ति मामले में सबको पछाड़ा

बस्ती (आरएनआई) डॉक्टर से हत्यारे की छवि तक पहुँच चुके चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. एस. के. गौड़ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। आठ वर्षों में 100 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति अर्जित करने वाले इस डॉक्टर पर नकली दवाएं, लापरवाही, जबरन भर्ती और कमीशन आधारित इलाज जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। सोशल मीडिया पर इन्हें "हत्यारा", "लुटेरा", यहां तक कि "डकैत" कहा जा रहा है।

● मरीजों की मौतों में नंबर वन?
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, डॉ. गौड़ और एक अन्य निजी अस्पताल सूर्या में हर साल दर्जनों बच्चों की मौतें केवल लापरवाही और घटिया दवाओं की वजह से हो रही हैं। उपभोक्ता फोरम में दर्जनों मामले दोनों पर लंबित हैं। जिन मामलों में निर्णय हो चुका है, उनमें भारी जुर्माना और मुआवजा लगाया गया, फिर भी न तो सुधार हुआ और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही दिखाई गई।

● 5 लाख रुपये की रोज़ाना कमाई!
जांच रिपोर्टों और सोशल मीडिया दावों के मुताबिक, मरीज देखने के नाम पर ₹1 लाख, नकली दवाएं लिखने पर ₹1 लाख, जांचों के नाम पर ₹1 लाख, और भर्ती कराने पर ₹1 लाख तक वसूले जाते हैं। कुल मिलाकर रोज़ाना ₹5 लाख और सालाना ₹18 करोड़ की कमाई बताई जा रही है।

● इलाज के नाम पर टीबी का डर
डॉ. गौड़ पर यह भी आरोप है कि सामान्य सर्दी-खांसी या बुखार वाले बच्चों को भी "टीबी" बता कर भर्ती किया जाता है, ताकि मरीजों से अधिक पैसे वसूले जा सकें। रिपोर्ट्स के अनुसार, फर्जी टेस्ट, बिना मशीन की जांच, और घटिया दवाओं का उपयोग यहां आम बात बन गई है।

 सोशल मीडिया पर आक्रोश
सोशल मीडिया पर लोग खुलकर विरोध कर रहे हैं: "यह डॉक्टर नहीं डकैत है, बस्ती में काली कमाई का बादशाह।" "जेनरिक दवा को भी पूरी MRP में बेचता है।" "बिना इमरजेंसी फीस लिए मरीज को नहीं देखता, चाहे वह मर ही क्यों न जाए।"बच्चों के नाम पर खून चूसने वाला गैंग है।"

● संपत्ति और रुतबे की हकीकत
स्थानीय पत्रकारों और सूत्रों के अनुसार, डॉ. गौड़ न केवल चिकित्सा, बल्कि होटल, मैरिज हॉल और प्रॉपर्टी के धंधे में भी गहरी पैठ बना चुके हैं। जिले और लखनऊ सहित पहाड़ी इलाकों में अचल संपत्ति के बड़े-बड़े सौदे इनके नाम से जुड़े हुए हैं।

● प्रशासन और विभाग चुप क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि डीएलए, डीआई और स्वास्थ्य विभाग अब तक क्यों मौन हैं? जब शिकायतें लगातार आ रही हैं, फोरम के फैसले इनके खिलाफ जा रहे हैं और मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है — फिर क्यों अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई?

जब डॉक्टर भगवान की जगह "खूनी व्यवसायी" की छवि बनाने लगें, तो यह न केवल चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग — मासूम बच्चों — की सुरक्षा पर भी संकट है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस मामले में सख्त जांच और कार्रवाई करनी चाहिए, वरना बस्ती जैसे जिलों में स्वास्थ्य सेवा का मतलब सिर्फ लूट और मौत रह जाएगा।

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