ब्रज की सांझी: कला से साधना तक की यात्रा
सुधीर शुक्ला
वृन्दावन (आरएनआई) सखियन संग राधिका कुंवरि बीनत कुसुम अलियां, एक ही बानिक एक बैस दोऊ हाथन लियैं रंगीली डलियां। एक अनूपम माल बनावति, एक बैंनी गूंथत कुंद कलियां, सूरदास गिरधर आय ठाड़े, भये मानी है रंग रलियां।
ब्रज की अद्भुत परंपरा सांझी केवल सूखे रंगों का चित्रण नहीं, बल्कि भक्ति का ऐसा उत्सव है जो साधना और ध्यान के द्वार खोल देता है। जब संसार अपने पूर्वजों के ध्यान में लगा रहता है वहीं ब्रज में साँझी महोत्सव के रूप में युगल लीला का चिंतन करता है, इसलिए ब्रज उत्सवों का स्थान है नित्य लीला उत्सव ब्रज की संस्कृति है। पितृपक्ष में ब्रज के मंदिरों में रंग-बिरंगे रंगो से राधावल्लभ या बांकेबिहारीजी की लीलाएँ अंकित की जाती हैं, तब साधारण दर्शक इसे कला मान लेता है, परंतु रसिक भक्त इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन की साधना मानते हैं।
सांझी का अर्थ ही है ‘साझा करना’। भक्तजन सामूहिक रूप से कृष्ण लीलाओं का चिंतन करते हैं, भावों को साझा करते हैं और उन्हें रंगों से मूर्त रूप देते हैं। यह सामूहिक कला साधना है—जहाँ रंगों में रूप उभरते हैं, वहीं भावों में कृष्ण की उपस्थिति विद्यमान होती है।
ब्रजजन महीनों पहले से ही प्राकृतिक रंगों की तैयारी करते है। रंग पीसने और उन्हें संवारने की प्रक्रिया भी साधना का हिस्सा बन जाती है। हर ब्रजजन मन सोचता है—इस बार कौन-सी लीला रंगों से अंकित करनी है? रासलीला? यमुना-घाट? वृंदावन की वन-वाटिकाएँ? या फिर ठाकुरजी का श्रृंगार? इस चिंतन में ही भक्त का मन कृष्णमय हो जाता है।
जब उत्सव का समय आता है, तो मंदिर का प्रांगण रंगों का दिव्य रंगमंच बन जाता है। भक्तजन घंटों तक अपने श्वास और मन को साधते हुए सूक्ष्म चित्र उकेरते हैं। रंगों में जब मोर का पंख, गाय का स्वरूप, वृक्ष की पत्ती या यमुना का प्रवाह प्रकट होता है, तब साधक अपने शरीर से परे जाकर सीधे लीला में प्रवेश कर जाता है। इस अवस्था में वह केवल चित्र नहीं रचता, बल्कि कृष्ण से मौन वार्तालाप करने लगता है।
रूपलाल गोस्वामी ने लिखा है:
वृंदावन फूलन सों छायौ,
चलौ सखी फुलवा बीनन कौं।
सांझी कौ दिन आयौ,
प्रेम मगन ह्वै सांझी चीतौ,
पचरंग रंग बनायौ।।
सांझी का रहस्य यही है कि यह कला नहीं, बल्कि ध्यान की सहज विधि है। वह स्थिति, जिसे संत ऋषि-मुनि वर्षों की तपस्या से कठिनाई से प्राप्त करते हैं, ब्रजवासी इस अद्भुत परंपरा से सहज ही लीला में समा जाता हैं।
और जब कोई रसिक हृदय इसे अपनी वाणी में ढालता है, तो सांझी का उत्सव गीत और नृत्य की मधुरता से भर उठता है—
मैं हूं सांझी चीतन हारी
मैं हूं सांझी चीतन हारी,
नंदगांव की रहवे वारी।
तुमरो नाम सुन्यौ मैं प्यारी,
खेलूंगी मैं संग तिहारे।
जब तुम देंगी प्यार,
दै गलबैंया चली लाड़िली,
मुसकाई वह चित चाड़िली,
रस भीजीं भई प्रेम माड़िली।।
श्याम सखी जब सांझी चीतै,
देखैं ब्रज की नार,
सुंदर सी सांझी चितवायो,
सुंदर मीठे गीत गवायो,
सुंदर व्यंजन भोग लगायो,
मन भाई सी करै आरती।
ललिता हाव भाव पहिचान्यो,
ऐसोई सबको मन मान्यो,
तारी दै दै हंसी सखी सब,
आनंद भयौ अपार।।
इस प्रकार सांझी केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि वह रस, वह ध्यान, वह साधना है, जो ब्रज की आत्मा को जीवित रखे हुए है।
मूल ब्रजवासी गोदा बिहार मंदिर सेवा अधिकारी, ब्रज कला संस्कृति शोध संस्थान के श्री लक्ष्मी नारायण तिवारी जी, श्री यशोदानंदन मंदिर के सेवा अधिकारी, वृन्दावन शोध संस्थान अधिकारी श्री राजेश शर्मा जी दोनों ब्रजजन द्वारा ब्रज संस्कार, संस्कृति के प्रसार, प्रचार, संरक्षण में महती योगदान है। ब्रज आपकी सेवाओं को नमन करता है।
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