सुप्रीम कोर्ट में नाबालिगों के लिए पोर्न प्रतिबंध पर बहस: CJI गवई ने पूछा – “जानते हैं, नेपाल में प्रतिबंध की कोशिश के बाद क्या हुआ?”
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के लिए अश्लील वीडियो तक पहुंच पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी भी तरह के प्रतिबंध के सामाजिक परिणामों पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा— “आप जानते हैं, नेपाल में इसे प्रतिबंधित करने की कोशिश की गई थी, फिर वहां क्या हुआ?”
सीजेआई बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने सोमवार को यह टिप्पणी की, जब कोर्ट नाबालिगों के लिए अश्लील कंटेंट तक पहुंच पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हालांकि न्यायालय ने यह भी कहा कि यह मामला सरकार के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है, फिर भी 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को इस तरह की सामग्री से बचाने के उपायों पर विचार किया जाएगा।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील वरुण ठाकुर की दलीलें सुनीं। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों की डिजिटल पहुंच कई गुना बढ़ गई है। “अब 14 से 18 वर्ष के बच्चे सिर्फ एक क्लिक में मोबाइल पर अश्लील वीडियो देख सकते हैं,” वकील ने कहा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, चीन और अरब देशों में इस तरह के कंटेंट पर सख्त प्रतिबंध है।
इसी पर सीजेआई गवई ने नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां जब पोर्न वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब बड़े पैमाने पर युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए थे। कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंध लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि ऐसे निर्णय समाज पर क्या असर डाल सकते हैं।
पीठ ने हालांकि याचिका को पूरी तरह खारिज नहीं किया। कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार जारी रखने और मामले को चार सप्ताह बाद फिर से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
याचिका में कहा गया है कि भारत में हर सेकंड लगभग 5,000 अश्लील वीडियो साइटें देखी जाती हैं, और हर साल करीब 2 करोड़ नई वीडियो क्लिप्स इंटरनेट पर अपलोड की जाती हैं। अनुमान के मुताबिक, देश में 20 करोड़ से अधिक अश्लील वीडियो या क्लिपिंग मुफ्त में उपलब्ध हैं, जिनमें बाल अश्लीलता (child pornography) की सामग्री भी शामिल है।
याचिकाकर्ता ने आईटी एक्ट की धारा 69ए का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार के पास ऐसी वेबसाइटों को ब्लॉक करने की शक्ति है, लेकिन अब तक प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
याचिका में कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार को अश्लील वीडियो देखने पर रोक के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार करने और सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील कंटेंट देखने पर दंडात्मक प्रावधान लागू करने के निर्देश दिए जाएं।
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