वरदान नहीं, अभिशाप साबित हुई महागठबंधन की वोट अधिकार यात्रा, मतदाताओं को नहीं कर सकी प्रभावित
नई दिल्ली (आरएनआई)। बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बहुचर्चित वोट अधिकार यात्रा उम्मीदों के ठीक उलट साबित हुई। चुनावी रणनीति में इसे महागठबंधन का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा था, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि यह यात्रा मतदाताओं को लुभाने में नाकाम रही। दस जिलों में महागठबंधन का खाता तक नहीं खुला, जबकि जिन 25 जिलों में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने सबसे अधिक दौरे किए, वहीं महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा। यात्रा जिन 170 सीटों से होकर गुज़री, उनमें से कांग्रेस को सिर्फ 6 और पूरा महागठबंधन मिलकर केवल 19 सीटें ही जीत सका।
रोहतास से ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ के नारे के साथ शुरू हुई यह यात्रा चुनाव से पहले विपक्ष का संभावित गेमचेंजर मानी जा रही थी। चुनाव आयोग के एसआईआर को विपक्ष ने पूरे अभियान में केंद्र मुद्दा बनाया था और इसे लेकर उन्होंने 1,300 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली। लेकिन नतीजों ने संकेत दिया कि जिन 21 जिलों से यात्रा गुज़री, वहां के मतदाताओं ने विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। इन जिलों की कुल 170 विधानसभा सीटों में से महागठबंधन केवल 19 सीटों पर ही सिमट गया, जबकि शेष पर सत्तारूढ़ राजग ने दबदबा बनाए रखा।
यात्रा के शुरुआती बिंदु रोहतास जिले में सात में से छह सीटें राजग ने जीतीं। इसके अलावा शेखपुरा, नालंदा, लखीसराय, मुंगेर, सुपौल, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज और भोजपुर में विपक्ष का खाता तक नहीं खुला। रोहतास, औरंगाबाद, नवादा, कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी, पूर्वी चंपारण और सीवान जैसे जिलों में महागठबंधन को मुश्किल से एक–एक सीट मिली। इन जिलों की कुल 69 सीटों में से महागठबंधन केवल नौ सीटें जीत सका।
यात्रा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में जनसुराज पार्टी ने भी विपक्ष को नुकसान पहुंचाया। तीन सीटों पर जनसुराज और भाजपा के उम्मीदवार स्वजातीय होने से वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। इन सीटों पर जनसुराज उम्मीदवारों को मिले वोट हार–जीत के अंतर से ज्यादा थे। इसका सीधा फायदा राजद के उम्मीदवारों को मिला, फिर भी कुल मिलाकर विपक्ष का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अगर जनसुराज मौजूद नहीं होती, तो महागठबंधन की सीटें 19 से घटकर 16 तक रह जातीं।
यात्रा वाले मार्ग पर विपक्ष को केवल गया, पश्चिम चंपारण और सारण जैसे कुछ जिलों में आंशिक सफलता मिली—जहां वह क्रमशः 10 में से 2, 9 में से 2 और 10 में से 3 सीटें जीत सका। बाकी जिलों में प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा।
विपक्ष की पूरी रणनीति एसआईआर के मुद्दे को अगले साल होने वाले पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भुनाने की थी। लेकिन बिहार में इस मुद्दे की हवा निकल जाने के बाद विपक्ष की चुनावी नीति पर प्रश्नचिह्न लग गया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल में, जहां एसआईआर को बड़ा राजनीतिक हथियार माना जा रहा था, अब टीएमसी और विपक्षी दलों के सामने नया मुद्दा खोजने की चुनौती खड़ी हो गई है। भाजपा की निगाहें पहले से ही पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं और बिहार के नतीजों ने इस मुद्दे पर राजनीतिक समीकरणों को और उलझा दिया है।
वोट अधिकार यात्रा, जो महागठबंधन के लिए उम्मीद की किरण मानी गई थी, अंततः एक ऐसा कदम साबित हुई जिसने राजनीतिक लाभ पहुंचाने के बजाय विपक्ष को उल्टा नुकसान अधिक पहुंचाया।
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