वजीरे आजम की चुप्पी या साईडलाईन मतलब राजा को चेक और मैट अर्थात् "राष्ट्रपति पर महाअभियोग"
नई दिल्ली (आरएनआई) प्रधानमंत्री को उर्दू की भाषा में वजीरे आजम कहां जाता है। ओलम्पिक मान्यता प्राप्त खेल शतरंज में वजीर उसका प्रतिक होता हैं और वो कार्य करने के आधार पर सबसे ज्यादा शक्तियां रखता हैं । जब वजीर कार्य करना बन्द कर दे या अपने आप को साईड लाईन कर दे तो राजा को चेक व मेट मीलता हैं । राजनीति के सिद्धान्तों पर चलने वाले लोकतन्त्र में इसे राष्ट्रपति पर महाअभियोग लगने की संज्ञा से समझ सकते हैं।
आपरेशन सिंदूर व बाद में पाकिस्तान के साथ सीसफायर को लेकर इस मानसूस सत्र में राष्ट्रपति के ऊपर महाअभियोग चलना तय लग रहा है। यदि पहले की भांति लोकसभा अध्यक्ष ने व अब राज्यसभा सभापति ने इसे रोका या अस्विकार करने की कोशिश करी तो इस बार देश व सेना के गौरव पर दुनिया भर में पलीता नहीं लगेगा बल्कि भारत का स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में दुनिया में सिर उठाकर चलना मुश्किल हो जायेगा ।
भारत-सरकार व देश की कार्यपालिका जिसे संविधान में अलग-अलग रूप से अभिव्यक्त किया हैं । जो कार्यवाही के लिए जवाबदेही हैं उनसे आपरेशन सिंदूर, इसमें लडाकू विमानों का गिरना व पाकिस्तान के साथ सीसफायर करने की जानकारी और उसके तथ्यों का आधार, इनके माध्यम से न आकर दुनिया के दुसरे देश अमेरिका के राष्ट्रपति से आते हैं तो संविधान के अनुसार देश की मालिक और भारत-सरकार पर मालिकाना हक रखने वाली भारत की जनता की छाती पर मूंग दलना, नाक काट देना, सामान्य भाषा में पगडी उछालना व धर्म की भाषा में ईंश निन्दा करना यानि लोकतन्त्र में संविधान की निंदा करना होता हैं ।
भारतीय सेना के चीफ ऑफ डिफेन्स स्टॉफ का विदेश में विमान गिरने के सवाल पर स्वीकारोक्ति की भारत को आपरेशन सिंदूर में शुरूआती नुकसान हुआ व अब आपरेशन सिंदूर के दौरान विमानों के गिरने की जानकारी, वायुसेना प्रमुख द्वारा देश की कार्यपालिका यानि तथाकथित सरकार द्वारा उसके हाथ बांध देना जैसा रहस्योघाट और फिर सेना द्वारा उसके लिए जरूरी समानों व हर प्रोजेक्ट में देरी की बात सबसे बडे लोकतन्त्र, सम्पन्न, सम्प्रभुक्त व गौरवशाली भारत राष्ट्र के ललाट पर चिंताओं की लकीरें खीच देती हैं ।
आपको एक अत्यन्त गोपनीय जानकारी बता दूं कि संविधान में तिनों सशस्त्र सेना का सुप्रिम लीडर राष्ट्रपति को कहां गया हैं न कि कार्यपालिका प्रमुख प्रधानमंत्री को, भारतीय सेना को व भारत की सीमा से बाहर आपरेशन अपने लीडर यानि राष्ट्रपति के नेतृत्व में चलाना पडता हैं । प्रधानमंत्री सिर्फ सहयोग कर सकते है। अब सबसे बड़ा सवाल लोगों के दिमाग में यह झनझनाहट कर रहा हैं कि पाकिस्तान के सेना अधिकारी के एक फोन काल पर सीसफायर कैसे हुआ व राष्ट्रपति ने किस आधार पर अनुमति दी । उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक व कानूनी भाषा में राष्ट्रपति राजा नहीं होता इसलिए उन्हें यह तथ्य भारत-सरकार की प्रमुख होने के नाते भारत-सरकार की मालिक आम जनता को बताने पडेंगे ।
लोकसभा में राष्ट्रपति के खिलाफ महाअभियोग या सेना-प्रमुख के नाते नोटिस देकर संसद में बुलाने या जवाब मांगने के लिए संविधान के अनुसार लोकसभा या राज्यसभा के किसी भी सदन की संख्या का एक तिहाई सांसदों का हस्ताक्षर वाला संयुक्त आवेदन देना पडता हैं । यह सांसद पक्ष के हो या विपक्ष के यह मायने नहीं रखता क्योंकि यहां बात देश के सांसद या जनप्रतिनिधी की हो रही हैं न कि किसी राजनैतिक दल के माध्यम से चुने हुए सांसद की ।
यदि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने प्रस्ताव को रोका या खारिज किया तो आने वाला काल उनके लिए महासंकट बन जायेगा क्योंकि सिंदूर प्रोजेक्ट में गिरे विमान भारत के भी थे क्या? यह विमान भारत की सीमा में गिरे या पाकिस्तान की सीमा में? गिरे विमान के पायलेटों का क्या हुआ? यह आजाद हैं या विरोधी पक्ष की कैद में हैं? ऐसे-ऐसे सच्च उजागर होना बाकी है । इनमें सबसे बडा संकट प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति के बिच सीसफायर से पहले हुई बातचीत की रिकोर्डिंग जिसके दम पर कई बार भारत-पाकिस्तान के मध्य सीसफायर का क्रेडिट अमेरिका के राष्ट्रपति कई वैशविक मंचों पर ले चुके हैं । अब नोबेल शान्ति पुरुस्कार के आवेदन के रूप में दुनिया का हर देश इन प्रमाणों को देखेगा ।
राष्ट्रपति पर महाअभियोग का आवेदन दुसरी बार होगा और राष्ट्रपति पर सेना प्रमुख के नाते जवाबदेही में कोताही का मामला भी दुसरी बार होगा । मणिपुर में जिस आदिवासी महीला को नग्न कर घुमाया वो करगिल युद्ध में लड चुके सैनिक की पत्नी थी । देश की जनता को विश्वास था कि लडाकू विमान में बैठ कर उडने वाली राष्ट्रपति दूसरी बार पाकिस्तान की सीमा के पास या अन्दर विमान उडाकर आतंकवादियों के कैम्प पर बारूदी गोला नहीं मिसाईल गिरायेगी क्योंकि पहलगाम आतंकी हमले में महिलाओं की मांग से मिटे एक चुटकी भर सिंदूर की कीमत क्या होती हैं वो उन्होंने अपने जीवन में भोगा हैं ।
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक
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