महिला पत्रकारों के सामने डिजिटल हिंसा बन रही गंभीर चुनौती
नई दिल्ली (आरएनआई) पत्रकारिता का उद्देश्य समाज के सामने सच लाना और पीड़ितों की आवाज को मजबूत बनाना होता है। लेकिन जब पत्रकार स्वयं हिंसा और भय का शिकार बनने लगें, तो यह न केवल पत्रकारिता बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है। आज के डिजिटल युग में महिला पत्रकारों के सामने यह खतरा पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) की हालिया रिपोर्ट इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में तीन-चौथाई महिला पत्रकारों को ऑनलाइन हिंसा का सामना करना पड़ा है, जबकि हर चार में से एक महिला पत्रकार को शारीरिक हमले या जान से मारने की धमकी मिली है। यह हिंसा अब केवल गालियों या ट्रोलिंग तक सीमित नहीं रही, बल्कि एआई तकनीक, डीपफेक, डॉक्सिंग, और लैंगिक दुष्प्रचार जैसे नए डिजिटल हथियारों के जरिए और खतरनाक रूप ले चुकी है।
इन हमलों का मुख्य उद्देश्य महिला पत्रकारों को डराना, चुप कराना और उनकी साख को नष्ट करना है। उन्हें मानसिक रूप से इस कदर परेशान किया जाता है कि वे संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग करने से हिचकने लगती हैं। विशेष रूप से वे महिला पत्रकार, जो महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक हिंसा, असमानता और सत्ता के दुरुपयोग जैसे विषयों पर काम करती हैं, अधिक निशाने पर होती हैं।
यूनेस्को की चेतावनी स्पष्ट है — डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शुरू होने वाली हिंसा अब वास्तविक दुनिया में भी दिखाई देने लगी है। हाल के एक अध्ययन में पाया गया कि 14 प्रतिशत महिला पत्रकारों को ऑनलाइन धमकियों के परिणामस्वरूप वास्तविक जीवन में हिंसा झेलनी पड़ी।
यह सवाल उठता है कि आखिर महिला पत्रकार ही क्यों?
दरअसल, जब कोई महिला पत्रकार महिलाओं के अधिकारों या सामाजिक अन्याय पर लिखती है, तो वह उन शक्तियों को चुनौती देती है जो महिलाओं को सीमाओं में बांधकर रखना चाहती हैं। यही कारण है कि महिला पत्रकारों को बदनाम करने, धमकाने और उनकी छवि धूमिल करने की कोशिशें तेज हो रही हैं।
एआई तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। डीपफेक के माध्यम से महिला पत्रकारों की फर्जी तस्वीरें और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे हैं। डॉक्सिंग के जरिए उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक कर दी जाती है, जिससे उनके और उनके परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
यह कोई नया संकट नहीं है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सम्मेलन 2020 की स्नैपशॉट रिपोर्ट में भी बताया गया था कि 73 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का सामना किया, 25 प्रतिशत को शारीरिक हिंसा की धमकी मिली, और 18 प्रतिशत को यौन हिंसा की धमकियों का सामना करना पड़ा।
यूक्रेन में किए गए एक सर्वेक्षण में 81 प्रतिशत, जबकि जिम्बाब्वे में 63 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा की बात स्वीकार की। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है — हाल ही में दिल्ली में एक टीवी चैनल की महिला पत्रकार के साथ रात को घर लौटते समय पीछा करने की घटना सामने आई।
सोशल मीडिया पर महिला पत्रकारों को अपमानजनक टिप्पणियों, धमकियों और चरित्रहनन का लगातार सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण कई पत्रकार मानसिक दबाव में आकर संवेदनशील विषयों पर बोलना या लिखना बंद कर देती हैं।
यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करती है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी चोट पहुंचाती है। अब समय आ गया है कि सरकारें, मीडिया संस्थान और समाज मिलकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं — ताकि वे निर्भय होकर सच को सामने ला सकें और लोकतंत्र की रक्षा कर सकें।
Follow RNI News Channel on WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029VaBPp7rK5cD6X
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0



