भीड़ हिंसा पीड़ितों को मुआवजा दिलाने की याचिका खारिज — सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में दखल से किया इनकार
नई दिल्ली (आरएनआई) — सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) के पीड़ितों को मुआवजा देने का निर्देश देने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि हर भीड़ हिंसा का मामला अलग परिस्थितियों में होता है, इसलिए उसे एकसमान जनहित याचिका के तहत नहीं निपटाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो राज्य सरकार से प्रत्यक्ष रूप से संपर्क कर सकता है, जैसा कि उच्च न्यायालय ने सुझाव दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश
15 जुलाई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि भीड़ हिंसा के मामलों की प्रकृति अलग-अलग होती है, इसलिए अदालत इस पर सामूहिक रूप से निगरानी नहीं रख सकती। अदालत ने यह भी कहा था कि प्रभावित पक्ष या संगठन राज्य सरकार या संबंधित प्राधिकरण के पास जाकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुपालन की मांग कर सकते हैं।
तहसीन पूनावाला मामले का हवाला
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के तहसीन पूनावाला मामले (2018) में दिए गए दिशा-निर्देशों का हवाला दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ हिंसा रोकने के लिए कई कड़े निर्देश जारी किए थे, जिनमें शामिल हैं—
हर जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर का नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो लिंचिंग से जुड़ी घटनाओं की निगरानी करे।
राज्य सरकारें तीन सप्ताह के भीतर उन जिलों की पहचान करें, जहां पहले लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं।
सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने या अफवाहें उकसाने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153ए के तहत स्वत: एफआईआर दर्ज हो।
सीआरपीसी की धारा 357(ए) के तहत भीड़ हिंसा पीड़ितों के लिए मुआवजा योजना तैयार की जाए।
लिंचिंग मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में की जाए और छह महीने के भीतर मुकदमे पूरे हों।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि चूंकि उच्च न्यायालय ने पहले ही उचित दिशा दी है और राज्य सरकार से प्रत्यक्ष पहल करने को कहा है, इसलिए इस चरण पर अदालत को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तहसीन पूनावाला केस के दिशा-निर्देश अभी भी लागू हैं और राज्य सरकारों को उनका पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
इस आदेश के साथ, भीड़ हिंसा पीड़ितों को सामूहिक रूप से मुआवजा दिलाने की जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनवाई समाप्त हो गई।
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