प्रकृति का प्रकोप या इंसानों की सजा? नदी-नालों ने ली अतिक्रमण का बदला

Aug 4, 2025 - 13:23
Aug 4, 2025 - 13:25
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प्रकृति का प्रकोप या इंसानों की सजा? नदी-नालों ने ली अतिक्रमण का बदला

गुना (आरएनआई) अब गुना के इतिहास की अमर तारीख है। शहर के नदी नालों में घुस चुके लोगों के घरों में नदी नालों ने तांडव किया। इस दिन आई बाढ़ से गुस्साए नदी-नाले एकजुट होकर घरों में घुस गए। बदला लेने के लिए ये सबसे पहले उनके घरों में घुसे जिन्होंने बेशर्मी से नदी नालों को उजाड़ कर उनमें अपना घर बसाया है। मैं गरीब हूं कहकर नालों की छाती पर मूंग दलने वालों के साथ भी प्रकृति ने बिना भेदभाव के समान न्याय किया है।

इसके बाद नदी नाले अपने साथ गाद-गंदगी लेकर उन लोगों के घरों में भी घुस गए जो तब खामोश थे, जब उनके पड़ोस के ही लोग नदी नालों की हत्या कर रहे थे। डंपरों, ट्रेक्टर-ट्रॉलियों और मशीनों से उन पर मिट्टी डाल कर उन्हें जिंदा ही दफना रहे थे। अपनी आंखों के सामने नदी नालों पर यह अन्याय होता देखकर भी ये लोग तब खामोश थे।

शायद इसी खामोशी की सजा उन्हें भी दी गई कि,, तुम तो रोक सकते थे न, फिर तुमने मेरे साथ हुए अपराध को क्यों नहीं रोका था। सबने मिलकर हमारा तमाशा बनाया, और तुम चुप रहे, अब तुम सबका तमाशा दुनिया देखेगी। नेता आएंगे-जाएंगे, साग-पूड़ी, मुआवजा लाएंगे और तब हम तुम्हारी बरबादी का तमाशा चुपचाप देखेंगे। चंद घंटों में रौद्र रूप दिखाकर अब शांत हो चुके नदी नालों की चुप्पी कुछ ऐसा ही कह रही है।

शहर के किनारों पर खड़े गोपालपुरा, सिंहवासा जैसे बड़े तालाब और अपनी जिंदगी की आखिरी सांसे गिन रहा भुजरिया तालाब तो अभी भी तमतमा रहे हैं। उनकी उछाल मारती लहरों का शोर, चुनौती पूर्ण संदेश दे रहा है कि मगरुर शहर वालों अभी भी वक्त है, सुधर जाओ। प्रकृति को चुनौती मत दो। नदी नालों पर सिर्फ नदी नालों का अधिकार है, ये अधिकार तुम उनसे मत छीनों, वरना किसी दिन हमारी सब्र टूटी तो तुम्हारी गृहस्थी के साथ साथ तुम्हारे सपनों के महल, गोदाम, घरौंदे और तुम्हें भी अपने साथ बहा ले जाएंगे। 

...जैसे तुम आज हमारी पहचान मिटा रहे हो न, वैसे ही तब तुम्हारी पहचान मिट जाएगी। और तब मेरे नदी नालों के कीचड़ में तुम्हें तुम्हारी शक्ल से नहीं बल्कि चैन, घड़ी, अंगूठी से ही पहचाना जाएगा। यही प्रकृति है। यही प्राकृतिक न्याय है। प्रकृति अमीर गरीब, ऊंच नीच, छोटा बड़ा, भाजपा कांग्रेस, मेरा तेरा, कच्चा पक्का कुछ नहीं देखती। न्याय सबके साथ करती है, कर रही है। 

बात बात पर सरकार को कोसने के आदि लोगों को #नागरिक_कर्तव्य का एहसास कराने के लिए ही प्रकृति ने उस दिन तांडव किया था। एक दिन में 13 इंच पानी बरसाना, जिससे सड़कें सामान्य यातायात के लिए भी बाधित हो जाएं। घर से बाहर भी न निकल सको। फिर गोपालपुरा डैम में अचानक तेजी से पानी बढ़ना, और उसे टूटने से बचाने के लिए उसके एक कोने की मिट्टी को छीला जाना। ये सब प्रकृति का प्रकोप ही है, इसे समय रहते समझने की जरूरत है। 

इस बार प्रकृति ने बस इतना रहम किया है कि कोई व्यापक जनहानि नहीं हुई। अभी भी नहीं सुधरे और #अतिक्रमण को जायज ठहराने के लिए जबरिया तर्क देते रहे कि प्लॉट मकान की रजिस्ट्री क्यों हुई! मकान बनाने से किसी ने रोका क्यों नहीं! सब भ्रष्ट हैं! भू माफिया पर कार्यवाही क्यों नहीं होती! सब मिले हुए हैं जी!

इस तरह की बातों से समाधान नहीं निकलने वाला। जब कोई मरना ही चाहता है तो दूसरा कोई क्यों और कब तक बचाए। जब मरेगा तब अर्थी में शामिल हो जाएंगे! इसलिए अभी भी वक्त है नदी नालों के बहाव क्षेत्र से अमीर-गरीब, कच्चे-पक्के, अच्छे-बुरे, मेरे-तेरे सभी के अतिक्रमण हटवाने की मांग बुलंद करो। या फिर अपना नाम पता लिखे अच्छे घड़ी, अंगूठी पहनने की आदत डाल लो।

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