नोएडा हिंसा मामले में नया मोड़: TOI रिपोर्ट में पुलिसकर्मियों की भूमिका पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में एक्टिविस्टों का बड़ा दावा

May 21, 2026 - 15:15
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नोएडा हिंसा मामले में नया मोड़: TOI रिपोर्ट में पुलिसकर्मियों की भूमिका पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में एक्टिविस्टों का बड़ा दावा

नोएडा में मजदूर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और आगजनी के मामले में अब एक नया और बेहद गंभीर मोड़ सामने आया है। में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में गिरफ्तार एक्टिविस्टों ने सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश पुलिस के दावों को चुनौती देते हुए सनसनीखेज आरोप लगाए हैं।

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि जिन व्हाट्सऐप संदेशों और सोशल मीडिया पोस्टों को पुलिस मजदूरों को भड़काने वाला बता रही है, वे वास्तव में एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर और एक डीसीपी के ड्राइवर द्वारा पोस्ट किए गए थे। अदालत में दाखिल जवाब में कहा गया है कि “रिचा ग्लोबल नोएडा” नामक व्हाट्सऐप ग्रुप में सड़क जाम, प्रदर्शन और कार जलाने से जुड़े जो स्क्रीनशॉट साझा किए गए, वे सेक्टर-142 में तैनात एसआई बीना और डीसीपी के ड्राइवर अनिल कुमार के अकाउंट से पोस्ट हुए थे।

यह मामला अप्रैल में हुए मजदूर आंदोलन और उसके बाद भड़की हिंसा से जुड़ा है। इस केस में इंजीनियर आदित्य आनंद और ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट रूपेश रॉय समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। दोनों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने चुनिंदा स्क्रीनशॉट और डिजिटल सामग्री को तोड़-मरोड़कर पेश किया और एक्टिविस्टों को झूठा फंसाने की कोशिश की।

याचिकाकर्ताओं के वकील मणिक गुप्ता और पूजा शर्मा ने अदालत में कहा कि पुलिस जिन पोस्टों को “उकसाने वाला कंटेंट” बता रही है, उनका स्रोत खुद पुलिस से जुड़े लोग थे। इस दावे ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में गिरफ्तार अन्य लोगों में लखनऊ निवासी पत्रकार और अनुवादक सत्याम वर्मा भी शामिल हैं, जो ‘मजदूर बिगुल’ पत्रिका से जुड़े बताए जा रहे हैं। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी ने अदालत में जमानत की अर्जी दाखिल की है। सत्याम वर्मा की पत्नी ने मामले की सीबीआई जांच की मांग भी उठाई है।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस पूरे मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की है। पुलिस का आरोप है कि कई व्हाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुपों के जरिए मजदूरों को उकसाने और हिंसा फैलाने की साजिश रची गई थी। इनमें “Against Labour Code”, “Hundred Flowers Group”, “Progressive Artists League Group”, “Naujawan Bharat Sabha” और “Bigul Media” जैसे कई ग्रुप शामिल बताए गए हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इन दावों के बाद यह मामला केवल मजदूर आंदोलन या कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच एजेंसियों की भूमिका, डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं।

भड़ास न्यूज़

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