तीर्थों के बिना हम संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकते-मुनिश्री निर्भीक सागरजी
गुना (आरएनआई) चारों गतियों की चौरासी लाख योनियों में चारों ओर दुख ही दुख हैं। हम जिस विषयभोग एवं धन संपदा में सुख मान रहे हैं वह सुख नहीं सुखाभास है। जो एक न एक दिन मिटने वाला है। यदि संसार में सुख होता तो तीर्थंकर जो महान पुण्यशाली होते हैं वह इस संसार को नहीं त्यागते। प्रत्येक व्यक्ति या प्रत्येक जीव द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव इन्हीं पंच परावर्तन में अपने आपको परिभ्रमण कराता रहता है। जो जीव जिस गति में पहुंच जाता है वहीं मस्त हो जाता है। वहां से निकलना नहीं चाहता। उक्त धर्मोपदेश चौधरी मोहल्ला स्थित पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर चातुर्मासरत मुनिश्री निर्भीक सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि इस असार संसार में हमें दुखों को देखकर वैरागय आना चाहिए क्योंकि इस संसार को किसी ने बनाया नहीं है मात्र बताया है। हम जैसे कर्म करेंगे उनका फल स्वयं हमें ही भोगना पड़ेगा। गीता में श्रीकृष्ण जी ने अपने उपदेश में यही कहा था कि इस सृष्टि को मैंने नहीं बनाया, न इसे में अथवा केाई और मिटा सकता है। यह तो स्वचलित व्यवस्था है।
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