टीवी बहस का सच: गालियाँ, नंगई और मुफ्त की मजबूरी

व्यंग्य/नवेद शिकोह

Sep 14, 2025 - 14:08
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टीवी बहस का सच: गालियाँ, नंगई और मुफ्त की मजबूरी

लखनऊ (आरएनआई) राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ! पोस्टर चिपका लो या दरी बिछा लो पर प्रवक्ता मत बनना। बड़ा कठिन और रिस्की काम है। सैकड़ों टीवी चैनल्स और ना जाने कितने ही बहुत बड़ी रीच के यूट्यूब चैनल्स। ना ना कर के हर दिन चार-पांच चैनलों में भी बैठें तो चार पांच घंटों तक निरंतर बैठना एक सजा सी लगती होगी। 

बड़े पर्दे के सितारों ने सैक्सी दिखने की प्रतिस्पर्धा में ऊपर से कपड़े उतारना शुरू किए थे, लेकिन टीवी पैनलिस्ट/पार्टी प्रवक्ताओं ने टीवी कैमरों के सामने घंटों बैठने से कपड़ों की रगड़ से बचने के लिए अब नीचे से कपड़े उतारने शुरू कर दिए हैं। घंटों एक जगह बैठ कर लड़ोगे,चीखोगे, संघर्ष करोगे, गालियां बकोगे, मां-बहन करोगे.. तो गालियां खाओगे भी। ऐसे में नीचे से पसीना निकलेगा ही। एक मिनट के ब्रेक में चेहरे का पसीना तो पोंछा जा सकता है, लेकिन नीचे से निकलते पसीने का टचअप नहीं किया जा सकता इसलिए कभी कभी सुविधा के लिए नीचे से वस्त्र हीन होना पड़ता होगा। 
वीडियो जर्नलिस्ट और पीसीआर चूक गया या खेल कर गया तो एक सैकेंड में नीचे की सलामी आपकी इज्जत का फालूदा निकाल देगी। जैसे कि भाजपा प्रवक्ता भाटिया जी के साथ हुआ। अक्सर कइयों के साथ ऐसा होता रहता है।

अंदाजा लगाई कि हर रोज हर चार घंटे बाद बदलते विषयों पर आपको ना सिर्फ नित्य बोलना हो बल्कि बहस करनी हो, पार्टी का पक्ष रखना हो, ना सिर्फ अपनी बात साबित करनी हो बल्कि नंगई भी आपको करनी पड़ती है,नंगा भी होना पड़ता है। कभी गालियां खानी पड़ती हैं तो कभी गालियां देनी भी पड़ती हैं। गालियां खा लीं तो मुश्किल, गुस्से में मुंह से गाली निकल गई तो मुकदमें झेलें। लाखों लोग सोशल मीडिया पर ट्रोल सो अलग करें। विरोधी पार्टी की महिला प्रवक्ता की खरी-खरी सुन ली तो भी मुश्किल,महिला से गाली खाना मुश्किल सख्ती से ऊंची आवाज में जवाब दे दिया तो महिला अपमान के ट्रैप में फंसने का रिस्क !

सबसे बड़ी और आश्चर्यजनक बात ये है कि पार्टी हित में इतनी बड़ी टीवी जेहाद में आपको गालियों की नेमतें और तमाम रिस्क ज्यादा मिलते हैं। बड़ी से बड़ी और दौलतमंद से दौलतमंद राजनीतिक पार्टी अपने टीवी प्रवक्ता को एक रुपया भी नहीं देती। ये भी एक बड़ा सवाल है कि वर्षों से दिन भर टीवी चैनलों पर पार्टी का पक्ष रखने वाले टीवी प्रवक्ताओं का घर कैसे चलता है। क्या वे गाली, दावे, प्रशंसा, लोकप्रियता ओढ़ते-बिछाते और खाते हैं?

 हां लोग उन्हें पहचानते हैं, साथ में फोटो खिंचवाते हैं। महफिलों में बाजारों में, ट्रेन में, एयरपोर्ट पर जहाज पर कहते हैं आप अच्छा बोलते हो। हमारे समाज के आम वर्ग में भी बद्तमीजों की कमी थोड़ी है, कोई मुंहफट बदतमीज कभी ये भी कह देता होगा कि- हमने आपको नंगे बैठकर नंगई करते देखा था।

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