"जनसंदेशिका": लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को संवैधानिक पहचान दिलाने की पहल
(शैलेंद्र बिरानी)
नई दिल्ली (आरएनआई) 21वीं सदी में सूचना और मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच एक ऐतिहासिक सोच उभर कर सामने आ रही है — मीडिया को लोकतंत्र का संवैधानिक चेहरा देने की मांग। यह विचार न केवल मीडिया की भूमिका को स्पष्ट करने की दिशा में है, बल्कि इसके ज़रिए लोकतंत्र के मालिक यानी जनता की बात सीधे राष्ट्रपति तक पहुँचाने की भी मजबूत व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करता है।
मीडिया की भूमिका: सोच बदलने का वाहक
हालांकि समय बदला है, पर सोचने की मानव प्रवृत्ति आज भी वही है। इस सोच को दिशा देने और वास्तविकता से जोड़ने में मीडिया ने सामाजिक स्तर पर अद्वितीय योगदान दिया है। अख़बार, समाचार चैनल, रेडियो, वेबसाइट, और पत्रिकाओं के माध्यम से मीडिया अब हर क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बन चुका है — राजनीति हो या व्यापार, समाज सुधार हो या जनजागरण।
"जनसंदेशिका": मीडिया को मिले संवैधानिक स्वरूप
इस नई सोच के तहत "जनसंदेशिका" नामक एक प्रस्तावित स्वतंत्र संस्था की परिकल्पना की गई है, जो मीडिया को एक संवैधानिक स्तम्भ का स्वरूप देगी। इसकी कार्यप्रणाली न्यायपालिका की तरह स्वतंत्र होगी और यह कार्यपालिका से पूर्णतः अलग होगी। इसमें पत्रकार, रिपोर्टर, चैनल प्रतिनिधि, संपादक, मालिक, और विश्लेषक सभी एक श्रृंखलाबद्ध तरीके से जुड़ेंगे।
कार्यप्रणाली: अस्थायी से स्थायी सदस्यता तक
जनसंदेशिका में पत्रकारों की नियुक्ति दो स्तरों पर होगी —
अस्थायी सदस्य, जो एक सप्ताह तक किसी खास मुद्दे पर रिपोर्ट बनाकर भेजेंगे।
स्थायी फोरम, जिसमें वही पत्रकार शामिल होंगे जो सबसे अधिक बार अस्थायी रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा बने हों। इनका कार्यकाल तीन महीने से दो वर्षों तक होगा।
संस्था का 30% प्रतिनिधित्व मीडिया संस्थानों के मालिकों व प्रशासकों से होगा, जिससे ग्राउंड रिपोर्टिंग और नीतिगत दिशा में संतुलन बना रहे।
राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंपने का प्रावधान
जनसंदेशिका के प्रमुख की नियुक्ति पत्रकार समुदाय द्वारा की जाएगी, लेकिन उन्हें शपथ राष्ट्रपति द्वारा दिलाई जाएगी और वे हर महीने एक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपेंगे। यदि किसी सिफारिश पर समयावधि में कार्यवाही न हो, तो उसे राष्ट्रपति के माध्यम से दोबारा भेजा जाएगा।
यह प्रणाली न केवल खबरों को विश्लेषण के स्तर पर और मजबूत बनाएगी, बल्कि राष्ट्रपति के सलाहकारी अधिकार को भी पुनर्जीवित करेगी, जो वर्तमान समय में लगभग निष्क्रिय हो चले हैं।
जनता की भावना सीधे पहुंचे राष्ट्रपति तक
यह प्रस्ताव लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को प्रभावी ढंग से राष्ट्रपति तक पहुँचाने का एक संवैधानिक मार्ग खोलने की दिशा में है, जिससे हर घटना का समुचित विश्लेषण हो और जनता को न्याय के लिए सड़कों पर बार-बार उतरने की आवश्यकता न पड़े।
लोकतंत्र का भविष्य: सोच, संवैधानिकता और सुधार की पहल
यह विचार एक सशक्त लोकतंत्र की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। मीडिया को केवल सूचना माध्यम न मानकर एक संविधानिक मंच देने की माँग समय की ज़रूरत बन चुकी है। आज जबकि मीडिया तकनीकी रूप से इतना सक्षम हो चुका है कि वह चुनावी नतीजों से पहले रूझान बता सकता है, तो क्यों न उसकी शक्ति को देश निर्माण में भी उतनी ही जिम्मेदारी से प्रयोग किया जाए?
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