चौथा स्तंभ डगमगा रहा हैं, क्योंकि पत्रकारिता का संगठन-संग्राम, अध्यक्ष, महासचिव की बाढ़ में पत्रकार क्यों पीड़ित?

Sep 5, 2025 - 23:47
Sep 5, 2025 - 23:48
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चौथा स्तंभ डगमगा रहा हैं, क्योंकि पत्रकारिता का संगठन-संग्राम, अध्यक्ष, महासचिव की बाढ़ में पत्रकार क्यों पीड़ित?

<एमपी (आरएनआई) लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता को सबसे मज़बूत माना गया था। माना जाता था कि अगर संसद सो जाए तो पत्रकार जगा देगा, अगर न्यायालय दब जाए तो पत्रकार खड़ा हो जाएगा, और अगर कार्यपालिका बहक जाए तो पत्रकार टोक देगा। पर अफ़सोस, आज पत्रकार खुद ही थाने कचहरी के चक्कर काट रहा है।

कारण? क्योंकि पत्रकार के नाम पर हर जिले–हर तहसील में संगठन का मेला लग चुका है, लेकिन पत्रकार अब भी अकेला और असहाय है।

संगठन की बाढ़, पत्रकार की सूखी ज़िंदगी

आज हालत यह है कि भारत के हर जिले में दर्जनों पत्रकार संगठन सक्रिय (?) हैं। नाम ऐसे कि सुनकर लगे मानो पत्रकारों के उद्धार की गारंटी दे देंगे 

राष्ट्रीय निष्पक्ष पत्रकार महासंघ

जनवादी स्वतंत्र प्रेस मंच

लोकतांत्रिक पत्रकार परिषद

अखिल भारतीय निर्भीक पत्रकार मोर्चा

डिजिटल–इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन

नाम बड़े, काम शून्य।

असल में इन संगठनों का गठन किसी पत्रकार के हित की चिंता से नहीं होता, बल्कि पद की भूख से होता है। जैसे ही किसी जिले में दो पत्रकारों में मतभेद हुआ, संगठन टूटकर दो भाग में बंट गया।

“तुम अध्यक्ष बन गए? ठीक है, अब मैं राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाता हूँ। तुम ज़िलाध्यक्ष ही रहो।” बस, नया संगठन तैयार!

सम्मान सम्मेलन की राजनीति

इन संगठनों की सबसे पसंदीदा गतिविधि है सम्मान समारोह।

किसी मंत्री, विधायक या अफसर को मंच पर बुलाओ।

फूलों की माला पहनाओ।

स्मृति–चिन्ह दो।

और फिर सेल्फ़ी डालो "पत्रकार हितैषी मंत्री जी का अभिनंदन किया गया।"

पत्रकार पर हमला हो तो यही संगठन “मीटिंग बुलाने” की घोषणा करते हैं और प्रेस नोट निकालते हैं हम निंदा करते हैं।”बस, काम ख़त्म। कभी किसी संगठन को यह कहते सुना कि “हम अपने घायल साथी की दवा का खर्च उठाएँगे”?

या “हम अपने साथी को न्याय दिलाने के लिए धरना देंगे”? कभी–कभार रस्मअदायगी के लिए थाने में ज्ञापन सौंपना ही इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

राजनीति की चाशनी और संगठन का मधुमेह

आज अधिकांश पत्रकार संगठन किसी न किसी पार्टी या नेता के पाले में पलते हैं।

भाजपा वाले संगठन भगवा नेताओं के साथ फोटो खिंचाते हैं।

कांग्रेस वाले राहुल–प्रियंका की तारीफ़ करते हैं।

क्षेत्रीय पार्टियों वाले अपने अपने “मालिक” की चरण वंदना करते हैं।

इनकी पहचान पत्रकारिता से नहीं, आका से होती है।

पत्रकार की असली लड़ाई मजीठिया वेतनमान, सुरक्षा कानून, फर्जी केस से बचाव किसी की एजेंडा सूची में नहीं है।

पत्रकार बनाम पत्रकार सबसे बड़ी विडंबना

अगर किसी पत्रकार पर हमला होता है तो संगठन आपस में ही भिड़ जाते हैं 

“हमारे संगठन ने मदद की।”

“नहीं, असली मदद तो हमने की।”

“वो तो नकली संगठन है, असली हम हैं।”

कभी–कभी तो ऐसा भी होता है कि जिस पत्रकार पर हमला हुआ है, उसी को दोनों संगठन अपनी सदस्यता के लिए खींचते हैं। पत्रकार सोचता है “संगठन लड़ने आए हैं या मेरे ऊपर राजनीति करने? यही कारण है कि पत्रकार संगठनों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता घटी है।

पत्रकार की ज़मीनी हालत

अब ज़रा असली पत्रकार की हालत देखिए –

अखबार और चैनल मालिक उसे स्ट्रिंगर बना देते हैं।

न तनख्वाह तय, न कोई अनुबंध।

बस खबर भेजो, विज्ञापन लाओ, और “कभी–कभार” मानदेय ले लो।

जब वह सच लिखता है तो नेता, अफसर और माफ़िया उसे धमकाते हैं। एफ़आईआर दर्ज होती है, थाने बुलाया जाता है, कोर्ट में घसीटा जाता है। उस वक्त संगठन वाले भाई साहब “निंदा और चिंता” व्यक्त करके आगे निकल जाते हैं।

कुछ ताज़े उदाहरण

1. मध्यप्रदेश के तमाम जिलों में कई बार शहरी और ग्रामीण पत्रकारों पर हमले हुए। कई की जान तक चली गई। संगठन? चुप।

2. उत्तरप्रदेश, में जब एक पत्रकार पर खनन माफिया ने हमला किया, तब संगठन ने दो दिन तक प्रेस नोट जारी किए और तीसरे दिन मंत्री के साथ मंच पर दिख गए।

3. राजस्थान में एक पत्रकार को भ्रष्टाचार की खबर लिखने पर फर्जी केस में फंसा दिया गया। संगठन ने कहा “हम इसकी जांच कराएंगे।” जांच आज तक अधूरी है, लेकिन संगठन ने उसी जिले में सम्मान समारोह कर लिया।

पत्रकार का संघर्ष, संगठन का उत्सव

पत्रकार थाने में जमानत ले रहा होता है और संगठन उसी दिन “पत्रकार एकता दिवस” मना रहा होता है।

पत्रकार अस्पताल में घायल पड़ा होता है और संगठन “राष्ट्रीय अधिवेशन” कर रहा होता है। पत्रकार बेरोज़गार होकर घर बैठा होता है और संगठन का महासचिव नवीनतम एसयूवी में घूम रहा होता है।

संगठनों का ठेकेदारी मॉडल

कई संगठन तो अब खुलेआम “ठेकेदारी” मॉडल पर चल रहे हैं।

पत्रकारिता का प्रशिक्षण

प्रेस आईडी कार्ड

प्रेस क्लब की सदस्यता

और यहाँ तक कि “पत्रकार पुरस्कार”

सब कुछ पैकेज में मिलता है।

यानी पैसा दो, पत्रकार बन जाओ।

सच लिखो या झूठ, संगठन को फ़र्क नहीं पड़ता।

नतीजा -पत्रकार असुरक्षित

इतने संगठन होने के बावजूद पत्रकार आज सबसे असुरक्षित है।

न नौकरी की गारंटी। न सुरक्षा की व्यवस्था। न न्यूनतम वेतनमान। न किसी हमले पर ठोस कार्रवाई। संगठन का वजूद बस फोटो, फेसबुक पोस्ट और प्रेस कॉन्फ़्रेंस तक सीमित है। आज स्थिति इतनी हास्यास्पद है कि अगर कोई पत्रकार मरे, तो संगठन सबसे पहले यह तय करते हैं कि श्रद्धांजलि सभा हमारे संगठन की होगी या उनके?

पत्रकार की पीड़ा पर राजनीति, पत्रकार की मौत पर प्रतिस्पर्धा और पत्रकारिता के नाम पर कारोबार यही संगठनों का सच है। पत्रकार की असली ताक़त कलम थी। पर अब कलम तोड़ दी गई है, और उसकी जगह ले ली है संगठन के बैनर और मंच ने.

पत्रकार संगठन बहुत हैं, लेकिन पत्रकार आज भी अकेला है। अध्यक्ष महासचिव की बाढ़ में पत्रकार की आवाज़ डूब चुकी है। और जब तक संगठन ईमानदारी से एकजुट नहीं होंगे, तब तक पत्रकार हमेशा पीड़ित ही रहेगा।?

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