क्यों ऑनलाइन गेमिंग बैन न्यायिक कसौटी पर खरा नहीं उतर पाएगा
भारतीय न्यायशास्त्र यह मांग करता है कि राज्य अपने उद्देश्यों को पाने के लिए सबसे कम हस्तक्षेपकारी उपाय चुने। पूर्ण प्रतिबंध सबसे कठोर और दखल देने वाला कदम है।
नई दिल्ली (आरएनआई) ऑनलाइन मनी गेमिंग पर हालिया प्रतिबंध संवैधानिक कसौटी पर टिक पाना मुश्किल है। प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल, 2025 जो 20-21 जून को संसद से पारित हुआ, सभी “रियल मनी गेम्स” (RMGs) पर रोक लगाता है, जिनमें खिलाड़ी जीत की उम्मीद से पैसे लगाते हैं। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य लत, धोखाधड़ी और वित्तीय नुकसान से नागरिकों को बचाना है।
लेकिन इस कानून में तीन बुनियादी खामियां हैं – यह मनमाना है, असंगत है, और अत्यधिक संरक्षणवादी है।
सबसे पहले, यह सरकार की लंबे समय से चली आ रही नीति से अचानक पलटाव है। 2023 में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों में संशोधन कर RMGs को नियामक ढांचे में लाया गया था। कंपनियों से मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून और डेटा संरक्षण कानूनों पर परामर्श किया गया, और जीएसटी सुधार कर इस उद्योग से कर वसूला गया। तब संदेश स्पष्ट था: सरकार इसे नियंत्रित करेगी, प्रतिबंध नहीं लगाएगी।
इसी भरोसे पर पूरा इकोसिस्टम खड़ा हुआ। 2020 से 2024 के बीच इस सेक्टर में ₹23,000 करोड़ का निवेश आया। 2023 तक इसने 1 लाख से अधिक नौकरियां दीं, जो 2025 तक दोगुनी होने का अनुमान है। कंपनियों ने KYC, धोखाधड़ी जांच और शिकायत निवारण तंत्र पर भारी खर्च किया। अब तक कोई नया तथ्य सामने नहीं आया जो अचानक इस यू-टर्न को जायज़ ठहराए।
दूसरे, यह कानून असमानों को समान मानता है। ऑफशोर बेटिंग साइटें, जो मनी लॉन्ड्रिंग के लिए ज्यादा जोखिमभरी हैं और भारतीय उपभोक्ताओं को कोई सुरक्षा नहीं देतीं, उन्हें घरेलू ऑपरेटरों के साथ एक ही श्रेणी में डाल दिया गया है। जबकि घरेलू कंपनियां वैधता चाहती थीं और स्वेच्छा से निष्पक्षता व AML मानकों का पालन कर रही थीं। दोनों को एक जैसा मानने से भारतीय कंपनियों को दंड मिलता है और यूज़र्स असुरक्षित विदेशी प्लेटफॉर्म्स की ओर धकेले जाते हैं — जिससे कानून का घोषित उद्देश्य ही कमजोर पड़ता है।
तीसरे, यह प्रतिबंध अनुपातिकता की कसौटी पर विफल है। भारतीय न्यायशास्त्र कहता है कि राज्य को उपलब्ध सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाना चाहिए। पूर्ण प्रतिबंध सबसे कठोर कदम है। अन्य देशों में नियामक हल्के उपाय अपनाते हैं — जैसे सेल्फ-एक्सक्लूज़न टूल्स, समय और खर्च की स्वैच्छिक सीमाएं, अभिभावक नियंत्रण, और स्वतंत्र प्रमाणन तंत्र। प्रतिबंध कभी भी हानिकारक व्यवहार को समाप्त नहीं करते, बल्कि उसे भूमिगत और ज्यादा खतरनाक बाजारों में धकेल देते हैं। अमेरिका का अनुभव बताता है कि ऐसे कदम कर राजस्व के नुकसान और ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की ओर यूज़र्स के पलायन को बढ़ावा देते हैं।
यह मामला मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा है। जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि निजता व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और स्वायत्तता की रक्षा करती है — जिसमें यह अधिकार भी शामिल है कि कोई व्यक्ति अपने निजी जीवन के फैसले खुद ले, चाहे वह परिवार, धर्म, खानपान या पहनावे से जुड़े हों। अवकाश और मनोरंजन की स्वतंत्रता भी इसी दायरे में आती है। नागरिकों की अपनी पसंद का मनोरंजन चुनने की आज़ादी छीनना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत उनकी स्वायत्तता का उल्लंघन है। अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि बदलते सामाजिक नैतिक मानदंडों के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
RMGs पर पूर्ण प्रतिबंध ज़्यादातर नैतिक अस्वीकृति से प्रेरित दिखता है, न कि साक्ष्य या संतुलित नीति से। अगर अदालत में चुनौती दी गई, तो यह कानून मनमानेपन और असंगतता के आधार पर गिर सकता है। भारतीय संवैधानिक परंपरा ऐसे भारी-भरकम अतिक्रमणों को स्वीकार नहीं करती।
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