आरएसएस का अमेरिकी लॉबिंग विवाद: पाकिस्तान और सऊदी से जुड़े फर्म को दिए 2.75 करोड़ रुपये का भुगतान!
नई दिल्ली (आरएनआई)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक नए विवाद में घिर गया है। अमेरिका में अपनी ‘राष्ट्रवादी’ छवि को मजबूत करने के लिए संघ ने वाशिंगटन डीसी स्थित मशहूर लॉ फर्म Squire Patton Boggs (SPB) को हायर किया है। इस फर्म का नाम पहले पाकिस्तान सरकार और सऊदी अरब के हितों की पैरवी करने के मामलों में जुड़ चुका है। यही फर्म जमाल खशोगी हत्याकांड के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की छवि सुधारने वाले अभियान में भी शामिल रही थी।
खबरों के अनुसार, आरएसएस ने इस फर्म को अमेरिका में अपने 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अमेरिकी सांसदों और नीति-निर्माताओं के बीच संगठन की “सकारात्मक छवि” पेश करने के लिए नियुक्त किया। इस अभियान का उद्देश्य आरएसएस की ऐतिहासिक छवि को लेकर उठते विवादों—जैसे कि फासीवादी जड़ों और अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा के आरोप—को कम करना और संगठन को अमेरिकी राजनीतिक ढांचे में ‘मुख्यधारा’ में स्थापित करना बताया जा रहा है।
लॉबिंग रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड्स के मुताबिक, Squire Patton Boggs को इस साल के पहले तीन क्वार्टर में कुल $330,000 (लगभग ₹2.75 करोड़) का भुगतान किया गया है। यह रजिस्ट्रेशन 16 जनवरी 2025 को किया गया था। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि जब आरएसएस खुद को “व्यक्तियों का संगठन” बताता है और टैक्स नहीं देता, तो इतनी बड़ी रकम विदेश में लॉबिंग पर खर्च करने के लिए उसके पास धन कहां से आया?
इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यही फर्म पाकिस्तान सरकार के लिए भी लॉबिंग करती रही है। ट्रंप प्रशासन के दौरान SPB ने Orchid Advisors के साथ मिलकर अमेरिकी-पाकिस्तानी व्यापारिक समझौतों और खनिज निवेश जैसे विषयों पर पैरवी की थी। वहीं, 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद सऊदी अरब की “रिपुटेशन रिस्टोरेशन” के लिए भी यह फर्म काम करती रही। इन तथ्यों ने आरएसएस और SPB के इस गठजोड़ पर और सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस लॉबिंग को अमेरिका के Lobbying Disclosure Act (LDA) के तहत पंजीकृत किया गया है, न कि Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत, जिससे पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसी तरह की लॉबिंग कोई विपक्षी संगठन करता, तो मीडिया और सत्ताधारी दल का रुख बिल्कुल अलग होता।
पत्रकार सौमित्र रॉय के अनुसार, आरएसएस ने यह भुगतान क्रिप्टोकरेंसी (Bitcoin) के जरिए किया, जो पारदर्शिता के लिहाज से और भी गंभीर मामला बनाता है। उनका कहना है कि आरएसएस भारत में पंजीकृत संस्था नहीं है, न ही टैक्स देती है, फिर भी इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन करने की उसकी क्षमता और वैधता पर सवाल उठते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या आरएसएस ने यह लॉबिंग केंद्र सरकार की अनुमति से की? और अगर नहीं, तो क्या यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला नहीं बनता? भारत-अमेरिका ट्रेड डील से आरएसएस को क्या लाभ मिल सकता है, यह भी रहस्य बना हुआ है।
आलोचकों का कहना है कि एक ओर आरएसएस ‘स्वदेशी’ और ‘सेवा’ की बात करता है, वहीं दूसरी ओर विदेशी फर्मों को लाखों डॉलर देकर अपनी छवि सुधारने की कोशिश करता है। इससे संघ के “राष्ट्रवाद” की साख पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिका में दर्ज दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट है कि RSS ने पहली बार अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में संगठित तरीके से अपनी पहुंच बनाने की कोशिश की है — लेकिन जिस फर्म को चुना गया, उसके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यह कदम संघ के लिए एक बड़ा नैतिक और राजनीतिक विवाद बनता जा रहा है।
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