आज पहली बार भारत आ रहे अफगानी विदेश मंत्री; तालिबान के जरिए PAK को घेरने की तैयारी
नई दिल्ली (आरएनआई)। अफगानिस्तान के तालिबानी विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्ताकी बृहस्पतिवार, 9 अक्तूबर 2025 को भारत का पहला औपचारिक दौरा शुरू कर रहे हैं — यह तालिबान के 2021 में सत्ता संभालने के बाद भारत का किसी वरिष्ठ तालिबानी प्रतिनिधि से हुआ उच्चस्तरीय संपर्क माना जा रहा है। मुत्ताकी की अंतरराष्ट्रीय यात्रा संभव तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संबंधित समिति ने उन्हें सीमित अवधि (9–16 अक्तूबर 2025) के लिए यात्रा छूट दी।
दौरान मुत्ताकी के केंद्रीय अधिकारियों से मुलाकात करने की चर्चित सूची में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल शामिल हैं; सरकार ने प्रधानमंत्री से मुलाकात के विषय पर औपचारिक पुष्टि नहीं की है। इस यात्रा का एजेंडा कूटनीतिक संपर्क, व्यापार—विशेषकर ड्राई फ्रूट व मानवीय व पुनर्निर्माण सहयोग—कंसुलर सेवाएं व क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे बताए जा रहे हैं।
मौक्के की संवेदनशीलता इसलिए भी है क्योंकि मुत्ताकी यूएन प्रतिबंध सूची में नामांकित हैं और यात्रा छूट का निर्णय सुरक्षा परिषद में अलग से लिया गया। इस पहल को क्षेत्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है — एक तरफ यह अफगानिस्तान के साथ व्यवहारिक संपर्क बढ़ाने की दिशा है, वहीं दूसरी तरफ कई सुरक्षा व मानदंडात्मक सवाल भी उठते हैं।
विदेश नीति व सुरक्षा विशेषज्ञ इस दौरासे जुड़े संभावित फायदे और जोखिमों दोनों पर टिप्पणी कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह दौरा दोतरफा हितों — मानवीय/आर्थिक और आतंकवाद-विरोधी समन्वय — पर बातचीत खोलने का अवसर है। दूसरी ओर, कुछ विश्लेषक राजनीतिक मान्यता के मसले पर सतर्क रुख बनाए रहने की सलाह भी दे रहे हैं। मुत्ताकी ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि इलाके में सक्रिय उन्मूलनकारी गिरोहों (जिनसे क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित होती है) के खिलाफ समन्वय की आवश्यकता है — ऐसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत संभव है।
प्रचार में यह चर्चा उठ रही है कि तालिबान से भारत के बढ़ते संपर्क का पाकिस्तान पर भूराजनीतिक प्रभाव क्या होगा। इस तरह के निहितार्थों का आकलन जटिल है और विशेषज्ञों के बीच राय विभाजित है; कुछ का मानना है कि अफगानिस्तान पर प्रभाव रखने वाले बाहरी खिलाड़ी (चीन, पाकिस्तान आदि) इस नए संवाद को करीब से देखेंगे, जबकि अन्य कहते हैं कि भारत का प्राथमिक उद्देश्य अफगानिस्तान की स्थिरता व मानवीय सहायता सुनिश्चित करना है — किसी भी बड़े राजनीतिक निर्णय (जैसे औपचारिक मान्यता) पर अभी निर्णय नहीं लिया गया है।
संक्षेप में, मुत्ताकी का यह दौरा भारत–अफगान रिश्तों में व्यवहारिक संपर्कों (ह्यूमैनिटेरियन, आर्थिक व सुरक्षा समन्वय) को पुनर्जीवित करने का एक कदम माना जा रहा है। यह जरूरी नहीं कि तत्काल मान्यता या बड़े राजनयिक बदलाव का संकेत हो, पर यह क्षेत्रीय कूटनीति और सुरक्षा पर नए संवाद के रास्ते खोलता है — और यही वजह है कि दिल्ली व पड़ोसी राजनैतिक हलकों में इस यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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