“कामचोर भारत सरकार?” — 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव को 14 साल से नजरअंदाज़ करने पर गंभीर सवाल

(शैलेन्द्र बिरानी)

Jul 31, 2025 - 22:45
Jul 31, 2025 - 22:52
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“कामचोर भारत सरकार?” — 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव को 14 साल से नजरअंदाज़ करने पर गंभीर सवाल

नई दिल्ली (आरएनआई) देश में टैक्स वसूली और मुफ्त योजनाओं पर भारी खर्च के बीच भारत सरकार पर एक बार फिर काम न करने और जनता के नवाचारों को नज़रअंदाज़ करने के गंभीर आरोप लगे हैं। एक इनोवेटिव फाइल — जो 15 करोड़ 14 लाख करोड़ रुपये (US$220 बिलियन) टर्नओवर के संभावित व्यवसाय पर आधारित है — पिछले 14 वर्षों से सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही है, जबकि इसे 2006 में ही भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने मान्यता दे दी थी (पेटेंट नं. 202881, दिनांक 06-10-2006)।

फाइल में क्या है?
यह फाइल एक ऐसे नवाचार पर आधारित है, जो स्वास्थ्य, ऊर्जा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई स्तरों पर भारत को सशक्त बना सकता है।

प्रतिवर्ष 220 बिलियन अमेरिकी डॉलर के टर्नओवर वाला व्यवसाय मॉडल

33% तक स्वास्थ्य व्यय में कमी

5000 से अधिक नई कंपनियाँ और लाखों नौकरियाँ

तेल आयात पर निर्भरता में भारी कमी

40 से अधिक देशों से खरीदी के प्रस्ताव

संयुक्त राष्ट्र, WHO, रेड क्रॉस, बिल गेट्स फाउंडेशन जैसे संगठनों की रुचि और संवाद

राष्ट्रपति कार्यालय तक पहुँची थी फाइल
इस तकनीकी प्रस्ताव को 2011 में राष्ट्रपति कार्यालय को प्रस्तुत किया गया था (लेटर रेफरेंस: P1/D/1908110208, दिनांक: 19-08-2011)। साथ में 3.5 किलो की विस्तृत रिपोर्ट संलग्न थी जिसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पत्राचार और सहयोग के प्रमाण भी सम्मिलित थे।

सरकार की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण नवाचार पर केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों ने 7 वर्षों में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया, जबकि यही सरकार हर वर्ष रिज़र्व बैंक से लाभांश मांगती है, कर्ज़ लेती है और लाखों करोड़ रुपये की मुफ्त योजनाओं पर खर्च करती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस परियोजना का 1% हिस्सा भी भारत के पक्ष में आता है, तो भारत को हर वर्ष 1.54 लाख करोड़ रुपये की आमदनी हो सकती है। यह वह रकम है जो सरकार सालों तक अंतरराष्ट्रीय कर्ज़दाताओं से मांगती रही है।

मीडिया और सिस्टम की विफलता
फाइल में यह भी उल्लेख है कि भारत के कई बड़े मीडिया संस्थान और पत्रकार इस विषय को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कैमरे और न्यूज-रूम में "चेहरे और कपड़ों" तक सिमटी पत्रकारिता देश के नवाचारों तक नहीं पहुँच पाती।

फाइल तैयार करने वाले इनोवेटर का आरोप है कि कई बार उन्हें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचित करने के बाद भी कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली।

क्या है अगला कदम?
यह प्रश्न भारत के हर जागरूक नागरिक के सामने खड़ा है – क्या हम ऐसी सरकार और व्यवस्था को "कामचोर" न कहें जो 15 करोड़ 14 लाख करोड़ रुपये की संभावनाओं को नजरअंदाज कर रही है, लेकिन 3 लाख करोड़ की फंडिंग के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है?

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