स्वतंत्रता दिवस पर ‘वोट चोरी’ विवाद: तिरंगा, संविधान और शहीदों के सम्मान पर उठे सवाल
शैलेन्द्र बिरानी
नई दिल्ली (आरएनआई) स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले देश की राजनीति में ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर माहौल गरमा गया है। देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल और संवैधानिक पदों पर बैठे कई नेताओं पर विपक्ष लगातार मतदाता सूची में धांधली और फर्जी वोटरों के नाम जोड़ने के आरोप लगा रहा है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग की मतदाता सूची में कई जगह एक ही पते पर 50-100 लोगों के नाम दर्ज हैं, वहीं कई व्यक्तियों के नाम एक से अधिक स्थानों पर पाए गए, जिससे सत्ता तक पहुंचने के लिए अवैध लाभ उठाया गया।
इन आरोपों के बीच कुछ सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह आरोप सही हैं, तो इस स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले और अन्य राष्ट्रीय धरोहरों पर ध्वजारोहण करने वाले माननीय अपने साथ ‘वोट चोरी’ का कलंक लेकर राष्ट्रध्वज, संविधान, स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों का अपमान करेंगे।
कड़े शब्दों में जारी एक बयान में कहा गया कि “यदि माननीयों में जरा भी शर्म और देशभक्ति है, तो वे सार्वजनिक रूप से घोषणा करें कि इस बार किसी राष्ट्रीय धरोहर या सरकारी भवन पर ध्वजारोहण करने से पहले अपने ऊपर लगे आरोपों से खुद को निर्दोष साबित करेंगे। जब तक यह साफ नहीं होता कि वे वोट चोरी के लाभार्थी नहीं हैं, वे केवल अपने घर पर ही तिरंगा फहराएं।”
विश्लेषकों ने यह भी सुझाव दिया कि यदि जनप्रतिनिधि संविधान की शपथ के कारण ध्वजारोहण के लिए बाध्य हों, तो वे राष्ट्रपति को लिखित में शपथ पत्र भेजें कि उनकी निर्वाचित सीट के सभी वोटरों की सूची और मतदान दिवस की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की जाए। यदि इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या फर्जी वोटिंग का लाभ मिलता है, तो इसे उनका इस्तीफा माना जाए।
आलोचकों ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ‘पहले आप, पहले आप’ के नाम पर एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए भी असली दोषियों को बचा रहे हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर मतदाता सूची और वीडियो रिकॉर्डिंग से जुड़े कई ‘सबूत’ घूम रहे हैं, जिनकी सच्चाई चुनाव आयोग द्वारा सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने पर सामने आ सकती है।
इस बयान में प्रधानमंत्री पर भी सीधा निशाना साधा गया और कहा गया कि “प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने वाले नेता पहले खुद शपथ पत्र देकर अपनी देशभक्ति साबित करें। इसके बाद प्रधानमंत्री भी ऐसा ही कदम उठाएं। अगर सभी सांसद और नेता सच्चे हैं, तो पारदर्शिता से परहेज क्यों?”
जनता के बीच यह बहस भी जोर पकड़ रही है कि क्या देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों को केवल कानूनी रूप से नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी अपने चरित्र और ईमानदारी का प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि तिरंगे और शहीदों के सम्मान पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे।
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