सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 'सिर्फ बेंगलुरु में रहने की चाह ट्रांसफर रोकने का आधार नहीं' — डॉक्टरों को झटका
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक में डॉक्टरों की याचिका को खारिज करते हुए बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि सिर्फ बंगलूरू में रहने की चाह से डॉक्टरों का ट्रांसफर नहीं रुक सकता है। ये मामला राज्य सरकार के नियम 'कर्नाटक स्टेट सिविल सर्विसेज नियम, 2025' से जुड़ा है।
बेंगलुरु (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बंगलूरू की 'कॉस्मोपॉलिटन (बहु-सांस्कृतिक) जीवनशैली बहुत आकर्षक है', लेकिन इसके बावजूद सरकारी डॉक्टरों को सिर्फ इस वजह से ट्रांसफर से नहीं बचाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने डॉक्टरों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने बंगलूरू से बाहर ट्रांसफर न करने की अपील की थी। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि डॉक्टरों का तबादला अन्य क्षेत्रों में कोई अन्याय नहीं है।
कोर्ट ने कहा, 'बंगलूरू की जीवनशैली बहुत आकर्षक है, लेकिन कर्नाटक के बाकी इलाके भी विकसित हैं। आप समाज का विशेष वर्ग हैं। अगर आप ही ट्रांसफर का विरोध करेंगे तो बाकी लोगों का क्या होगा? हम इस अपील को स्वीकार नहीं करते।' यह मामला कर्नाटक सरकार की तरफ से बनाए गए नए नियमों से जुड़ा है- 'कर्नाटक स्टेट सिविल सर्विसेज (मेडिकल अफसरों और अन्य स्टाफ का तबादला) नियम, 2025'। इन नियमों के तहत राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग में कार्यरत डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों का ट्रांसफर किया जा सकता है।
डॉक्टरों की याचिका में कहा गया था कि सरकार ने नियमों का ड्राफ्ट (प्रारूप) जारी करने और अंतिम रूप देने के बीच केवल एक हफ्ते का समय दिया, जिससे उन्हें आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि ड्राफ्ट में 'ग्रेटर बंगलूरू' जैसा कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अंतिम नियमों में इसे जोड़ दिया गया, जो नियम बनाने की प्रक्रिया के खिलाफ है।
इससे पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी इन नियमों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने यह नियम 2011 के अधिनियम की धारा 12 के तहत बनाए हैं और नियमों के मसौदे और अंतिम प्रकाशन के बीच कोई निश्चित समय तय नहीं किया गया है।
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