बजते नगाड़े, टीपदार स्वर और रंगमंच की रौनक: कहीं खो तो नहीं रही ब्रज की भगत-स्वांग परंपरा?

डॉ सीमा मोरवाल

Jul 13, 2026 - 23:18
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बजते नगाड़े, टीपदार स्वर और रंगमंच की रौनक: कहीं खो तो नहीं रही ब्रज की भगत-स्वांग परंपरा?

मथुरा। (आरएनआई) कभी नगाड़ों की गूंज, टीपदार स्वरों की मिठास और रातभर चलने वाले लोकनाट्य ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। आज वही भगत, स्वांग और नौटंकी जैसी समृद्ध लोकनाट्य परंपराएं धीरे-धीरे विस्मृति की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं। बदलते समय, डिजिटल मनोरंजन और घटते आयोजनों के बीच ब्रज की यह सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है।

लोकनाट्य भारतीय लोकजीवन की आत्मा रहे हैं। मेलों, उत्सवों और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसरों पर संगीत, अभिनय और नृत्य के माध्यम से लोकजीवन की अभिव्यक्ति ही आगे चलकर लोकनाट्य के रूप में विकसित हुई। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग लोकनाट्य शैलियां प्रचलित रहीं, जिनमें ब्रज का भगत-स्वांग, उत्तर प्रदेश की नौटंकी, कर्नाटक का यक्षगान, बंगाल का जात्रा, गुजरात का भवाई और महाराष्ट्र का तमाशा प्रमुख हैं।

ब्रज क्षेत्र की प्रमुख लोकनाट्य शैली **भगत-सांगीत** अपनी विशिष्ट गायन शैली और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के लिए जानी जाती है। ढोलक, मंजीरा, करताल, चिकारा, सारंगी और विशेष रूप से नगाड़ा इसकी पहचान रहे हैं। नगाड़े की आवाज गांव-गांव तक पहुंचकर लोगों को मंच की ओर आकर्षित करती थी।

इन लोकनाट्यों में पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कथाओं का मंचन किया जाता रहा है। राजा हरिश्चंद्र, मोरध्वज, नरसी, अमर सिंह राठौर, छत्रपति शिवाजी, हीर-रांझा और देशभक्ति से जुड़े प्रसंग दर्शकों को रातभर बांधे रखते थे। दोहा, चौबोला, सोरठा, आल्हा, लावनी, गजल और शेर जैसी पारंपरिक गायन शैलियां इनके प्रस्तुतीकरण को और प्रभावशाली बनाती थीं।

ब्रज के लोकनाट्य जगत में दीपचंद, हुकमचंद, रामसिंह सिसोदिया, में सिंह, ताराचंद प्रेमी, गिरिराज जी और मनोहर जी जैसे कलाकारों ने इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, उस दौर में सामाजिक चुनौतियों के बावजूद कृष्णा कुमारी माथुर, आशा रानी वर्मा, कमलेश लता आर्य, बेबी, मैना कुमारी और चांदनी जैसी महिला कलाकारों ने भी इस विधा को नई पहचान दिलाई।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण लोकनाट्य के दर्शक और आयोजन दोनों कम होते जा रहे हैं। इससे लोक कलाकारों की आजीविका भी प्रभावित हुई है और नई पीढ़ी का रुझान इस कला की ओर घटा है।

सांस्कृतिक जानकारों का कहना है कि ब्रज की भगत और स्वांग जैसी लोकनाट्य परंपराओं को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी संस्थाओं, सांस्कृतिक संगठनों, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों को मिलकर प्रयास करने होंगे। नियमित आयोजन, आर्थिक सहयोग और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देकर ही इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है।

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