18 साल से 'साथी मूंग' की खेती कर बढ़ा रहे आमदनी, किसान निर्मल सिंह बने मिसाल

Sunday, July 5, 2026 - 16:33
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18 साल से 'साथी मूंग' की खेती कर बढ़ा रहे आमदनी, किसान निर्मल सिंह बने मिसाल

जिले के तलवंडी साबो ब्लॉक के गोलेवाला गांव के किसान निर्मल सिंह गेहूं की कटाई के बाद 'साथी मूंग' की खेती करके अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं। निर्मल सिंह पिछले 18 सालों से मूंग की खेती कर रहे हैं। अच्छा मुनाफा देखते हुए उन्होंने इस साल भी 12 एकड़ में मूंग की फसल बोई है।

यह किसान बासमती और धान की देर से पकने वाली किस्मों की बुवाई से पहले 'साथी मूंग' की खेती करते हैं। इससे उन्हें एक अतिरिक्त फसल से अतिरिक्त आमदनी तो होती ही है, साथ ही मूंग की फसल अपनी जड़ों के प्राकृतिक गुणों के कारण नाइट्रोजन फिक्सेशन (नाइट्रोजन स्थिरीकरण) से मिट्टी में नाइट्रोजन उर्वरक की मात्रा भी बढ़ाती है। ऐसा करने से अगली फसल में कम नाइट्रोजन उर्वरक, यानी कम यूरिया उर्वरक की जरूरत पड़ती है। इससे किसान कम लागत में अच्छी फसल पा सकते हैं, और कम रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल के बावजूद अपनी उपज के लिए अच्छी कीमत भी हासिल कर सकते हैं।

उद्यमी किसान निर्मल सिंह का कहना है कि फसल चक्र में दालों को शामिल करने से उनकी जमीन की सेहत में सुधार हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस खेत में मूंग बोई जाती है, वहां बासमती और धान की देर से पकने वाली किस्मों की रोपाई 20 जुलाई के बाद ही की जाती है। इससे न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि बिजली की खपत भी कम होती है, और यह धान भी जून में लगाए जाने वाले 'परमल' धान के बराबर समय में ही पककर तैयार हो जाता है।

मेहनती किसान ने कहा कि वह 'साथी मूंग' के खेती वाले रकबे को बढ़ाने और जमीन को और अधिक उपजाऊ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 'साथी मूंग' 65 से 70 दिन की फसल है, जिसे गेहूं और धान के बीच बोया जाता है और इससे किसानों को अच्छा लाभ मिलता है। इस किस्म की औसत पैदावार 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ है।

उन्होंने बताया कि 'साथी मूंग' के बीज की बुवाई लगभग 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से की जाती है। गेहूं की कटाई के बाद खेत की जुताई किए बिना ही गर्मी वाली मूंग की बुवाई की जा सकती है। अगर खेत में गेहूं के डंठल नहीं हैं, तो 'जीरो-टिल ड्रिल' मशीन से भी मूंग की बुवाई की जा सकती है। उन्होंने कहा कि यह दलहनी फ़सल न केवल पौष्टिक भोजन देती है, बल्कि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर आने वाली धान की फ़सल के लिए भी फ़ायदेमंद साबित होती है।

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