मीडिया की अनदेखी और विदेशी प्लेटफॉर्म का दखल: क्या भारत में फिर लौट रही है 'कंपनी राज'?
नई दिल्ली (आरएनआई) देश में तेजी से बदलते सूचना तंत्र के बीच एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया नामक चौथे स्तंभ को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है? और क्या यह सब कुछ एक विदेशी कंपनी की सहायता से, सधे हुए तरीके से, 'डिजिटल गुलामी' की ओर ले जाने की साजिश है?
हाल ही में केंद्रीय मंत्री नीतिन गडकरी ने फास्टैग को लेकर एक अहम सरकारी जानकारी — ₹3000 के वार्षिक शुल्क से जुड़ी — किसी प्रेस कांफ्रेंस या PIB बुलेटिन के बजाय, सीधे विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' (पूर्व में ट्विटर) के निजी अकाउंट से जारी की। इससे कई पत्रकारों और मीडिया संस्थानों में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार अब देश के मीडिया संस्थानों को पूरी तरह दरकिनार कर, एक विदेशी मंच के अधीन करने की दिशा में बढ़ रही है?
इतिहास से सीखने की ज़रूरत
विश्लेषक याद दिलाते हैं कि जिस तरह अंग्रेज भारत में व्यापार के बहाने आये और ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के माध्यम से देश को दो सदियों तक गुलाम बना लिया, कुछ वैसा ही परिदृश्य अब डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के जरिए तैयार किया जा रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार 'कंपनी' की जगह 'प्लेटफॉर्म' शब्द ने ले ली है, और हथियार बने हैं — डाटा, एल्गोरिद्म और व्यूवर्स की संख्या।
क्या मीडिया को बना दिया गया है मोहताज?
आज भारत के अधिकांश प्रमुख सरकारी ऐलान पहले एक विदेशी सोशल मीडिया कंपनी के मंच पर डाले जाते हैं, जहां हर मीडिया संस्थान को उस प्लेटफॉर्म के 'नियमों व शर्तों' को स्वीकार कर अकाउंट बनाना अनिवार्य हो गया है। न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न आधिकारिक ब्रीफिंग — यह सूचना तंत्र लोकतंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक जिम्मेदारी या डिजिटल भ्रष्टाचार?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई मंत्री संवैधानिक पद पर रहते हुए अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट से सरकार से जुड़ी सूचना सार्वजनिक करता है, तो यह सीधे तौर पर संवैधानिक मर्यादाओं और मंत्री शपथ का उल्लंघन हो सकता है। यहां तक कि कुछ मीडिया विशेषज्ञ इसे संभावित मोनेटाइजेशन और निजी लाभ के रूप में भी देख रहे हैं — क्योंकि सोशल मीडिया पोस्ट पर लाइक, शेयर और व्यूवर्स से अब सीधा पैसा कमाया जा सकता है।
क्या मीडिया को अधिकार से वंचित रखकर सत्ता को फायदा?
एक बड़ा वर्ग मानता है कि मीडिया को संवैधानिक दर्जा व अधिकार न देकर सरकार खुद को असीमित नियंत्रण देना चाहती है। जब संवैधानिक दायित्व वाला कोई भी नेता या मंत्री विदेशी मंचों से सूचनाएं दे तो यह संदेह पैदा करता है कि कहीं सत्ता स्वयं ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की राह पर तो नहीं?
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