मंत्री के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेने वाले जज जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उठे सवाल
नई दिल्ली/भोपाल (आरएनआई): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित करने की सिफारिश के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कोलेजियम प्रणाली पर बहस तेज हो गई है। यह फैसला 14 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की बैठक में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर विचार करने के बाद लिया गया।
पहले छत्तीसगढ़ भेजने की थी तैयारी, इलाहाबाद का चुनाव क्यों?
शुरुआत में कोलेजियम ने जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट स्थानांतरित करने की अनुशंसा की थी। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर पुनर्विचार का आग्रह किया। सूत्रों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वे वरिष्ठता सूची में तीसरे नंबर पर होते और कोलेजियम का हिस्सा बन सकते थे, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में वे सातवें नंबर पर रहेंगे।
ट्रांसफर के पीछे उठ रहे कारण
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने हाल ही में मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह द्वारा मुस्लिम महिला सोफिया कुरैशी के अपमानजनक बयान पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।
इससे पहले उन्हें जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से उस समय ट्रांसफर किया गया था, जब वे वहां चीफ जस्टिस बनने की स्थिति में थे।
पत्रकार शीतल पी सिंह के अनुसार, यह कदम “उनके उदार और संवैधानिक रुख” के कारण उठाया गया माना जा रहा है।
आलोचनाओं का दौर
इस फैसले पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई है।
पत्रकार सौमित्र राय ने टिप्पणी की: “सत्ता के इशारे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ईमानदार जज को हटा दिया, जिसने मंत्री के खिलाफ स्वतः संज्ञान लिया था।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह ट्रांसफर न्यायिक निर्णयों पर राजनीतिक प्रभाव का संकेत देता है।
न्यायिक स्वायत्तता पर गहरी चोट?
कानूनी हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि:
क्या सरकार कोलेजियम के निर्णयों को प्रभावित कर रही है?
क्या संवेदनशील मामलों में स्वतः संज्ञान लेना अब जजों के लिए जोखिमभरा हो गया है?
क्या जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण अब ‘अनुकूलता’ के आधार पर तय हो रहे हैं?
जस्टिस श्रीधरन की छवि
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में वे वरिष्ठता सूची में दूसरे स्थान पर थे।
जातिगत हिंसा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े कई मामलों में उन्होंने स्वतः संज्ञान लेकर कड़े निर्देश दिए।
जम्मू-कश्मीर और मध्य प्रदेश—दोनों जगह उनका ट्रांसफर विवादों से घिरा रहा है।
कोलेजियम ने सरकार की आपत्ति मानते हुए ट्रांसफर में बदलाव तो किया, लेकिन इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि न्यायपालिका की स्वायत्तता दबाव में है। क्या यह निर्णय सिर्फ स्थानांतरण है या एक संदेश?
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