भूमि विवाद मामले में हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, एमपी सरकार को भेजा नोटिस
नई दिल्ली (आरएनआई): भूमि विवाद के एक मामले में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से लगभग पौने पांच साल की देरी से दायर अपील को स्वीकार करने के हाईकोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार समेत अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने कहा कि “राज्य सरकार की ओर से अपील दायर करने में चार वर्ष नौ महीने की देरी को स्वीकार करना हाईकोर्ट की विवेकहीनता को दर्शाता है।”
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी अपने फैसलों में स्पष्ट किया है कि राज्य को देरी माफ करने में कोई विशेष छूट नहीं दी जा सकती।
पाराशर ने यह भी कहा कि “सरकार ने अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही दिखाई है और सिर्फ सरकारी प्रक्रिया में देरी का हवाला देना पर्याप्त कारण नहीं है।” सुप्रीम कोर्ट ने शंकरगिर की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों से जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
भूमि विवाद का मामला — पृष्ठभूमि
मामला रतलाम जिले की 3.870 हेक्टेयर कृषियोग्य भूमि से जुड़ा है, जिसे शंकरगिर ने वर्ष 2002 में नीलामी के माध्यम से खरीदा था। वर्ष 2010 में तहसीलदार ने आदेश जारी कर कहा था कि यह भूमि मठ नव दुर्गा मंदिर की संपत्ति है।
शंकरगिर ने इस आदेश को चुनौती दी, जिस पर रतलाम की जिला अदालत ने 25 नवंबर 2019 को तहसीलदार का आदेश रद्द करते हुए कहा कि शंकरगिर इस भूमि के वैध मालिक और कब्जाधारी हैं तथा सरकार या मंदिर का इससे कोई संबंध नहीं है।
राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ लगभग चार वर्ष नौ माह की देरी से 2024 में हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इसी निर्णय को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद इस मामले ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की देरी और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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