भारतीय संविधान की व्याख्या पूरी तरह स्वदेशी: राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

Nov 21, 2025 - 11:09
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भारतीय संविधान की व्याख्या पूरी तरह स्वदेशी: राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

नई दिल्ली (आरएनआई). सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति संदर्भ मामले में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारतीय संविधान की भाषा भले ही विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं से प्रेरित हो, लेकिन इसकी व्याख्या, अर्थ और प्रयोग पूरी तरह स्वदेशी हैं। पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि ब्रिटेन की तरह भारत में अलिखित संविधान नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण और लिखित संविधान है, जिसकी अपनी स्वतंत्र व्याख्यात्मक परंपरा है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर शामिल थे, ने कहा कि अमेरिकी संविधान से भी भारतीय व्यवस्था अलग है, क्योंकि यहाँ कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों का स्वरूप और संतुलन अलग तरीके से तय है। पीठ ने कहा कि भारतीय संविधान केवल अपनाए जाने के समय ही परिवर्तनकारी नहीं था, बल्कि समय के साथ अपने इस्तेमाल और व्याख्या में भी लगातार विकसित होता गया है। एक जीवंत संवैधानिक ढाँचे के रूप में यह अपने औपनिवेशिक प्रभावों से आगे निकल चुका है।

अदालत ने अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी विधेयक पर राज्यपाल के पास पहली बार तीन विकल्प होते हैं – इसे मंजूरी देना, राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजना या टिप्पणियों के साथ विधानसभा को दोबारा विचार के लिए लौटाना। यदि विधानसभा संशोधन सहित या बिना संशोधन पुनः विधेयक भेजती है, तो राज्यपाल उसके बाद भी इसे राष्ट्रपति के पास भेजने का अधिकार रखते हैं।

सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं होते और अनुच्छेद 200 उन्हें विवेकाधिकार प्रदान करता है। हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास विधेयक को अनिश्चित समय के लिए रोककर रखने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद न्यायालय ने यह कहते हुए समयसीमा तय करने से इंकार कर दिया कि ऐसा निर्देश लोकतांत्रिक सत्ता-संतुलन में न्यायपालिका के अति-हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।

अदालत को बताया गया कि फिलहाल 33 विधेयक मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं, जिनमें अधिकतर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के हैं। न्यायालय ने कहा कि वह इस प्रक्रिया में समय सीमा निर्धारित करने का अधिकार नहीं रखता और यह दायित्व कार्यपालिका तथा विधायिका की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

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