भारतीय नौसेना प्रमुख अमेरिका दौरे पर, समुद्री सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर होंगी अहम चर्चाएं
नई दिल्ली (आरएनआई)।भारत और अमेरिका के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा देने के उद्देश्य से भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी बुधवार को अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर रवाना हुए। यह दौरा 17 नवंबर तक चलेगा। इस दौरान वे अमेरिकी हिंद-प्रशांत कमान और पैसिफिक फ्लीट के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर दोनों देशों के बीच नौसैनिक साझेदारी, सामरिक सहयोग और क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा की प्राथमिकताओं पर चर्चा करेंगे।
नौसेना ने बताया कि भारत-अमेरिका की नौसैनिक साझेदारी दोनों देशों के बीच व्यापक रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस यात्रा का उद्देश्य इस दीर्घकालिक समुद्री साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ और रणनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाना है। एडमिरल त्रिपाठी अपने अमेरिकी समकक्षों — हिंद-प्रशांत कमान के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो और पैसिफिक फ्लीट के कमांडर एडमिरल स्टीफन टी. कोहलर — से भी उच्चस्तरीय वार्ता करेंगे।
सूत्रों के अनुसार, चर्चा का प्रमुख फोकस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा समुद्री प्राथमिकताओं, मिलन युद्धाभ्यास जैसे बहुपक्षीय मंचों के तहत सहयोग बढ़ाने और समुद्री डोमेन अवेयरनेस (Maritime Domain Awareness) को मजबूत करने पर रहेगा। इसके अलावा, नौसेना प्रमुख अमेरिकी नौसैनिक संस्थानों और अभियानों से जुड़ी प्रमुख कमानों का दौरा भी करेंगे, जहां वे तकनीकी और रणनीतिक सहयोग की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करेंगे।
एडमिरल त्रिपाठी का यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब अमेरिका के गुआम में चारों क्वॉड देशों — भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया — की नौसेनाएं संयुक्त रूप से मालाबार-2025 युद्धाभ्यास में भाग ले रही हैं। यह अभ्यास 18 नवंबर तक चलेगा और इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के नए फ्रेमवर्क के तहत दोनों देशों के बीच पहला बड़ा सहयोगात्मक अभियान माना जा रहा है।
हालांकि क्वॉड देशों ने स्पष्ट किया है कि यह अभ्यास किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है, लेकिन चीन लगातार इस पर आपत्ति जताता रहा है। फिर भी, मालाबार अभ्यास हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था की दिशा में चारों देशों की साझी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
नौसेना प्रमुख का यह दौरा भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग को गहराई देने, समुद्री सुरक्षा ढांचे को और मजबूत बनाने तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और सामरिक कदम माना जा रहा है।
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