बंगाल की सियासी चौसर पर बदलाव के संकेत, TMC के बागी हुमायूं कबीर ने नई पार्टी का किया ऐलान
कोलकाता (आरएनआई)। पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने सोमवार को अपनी नई राजनीतिक पार्टी ‘जनता उन्नयन पार्टी’ के गठन का ऐलान कर दिया। उनके इस कदम को राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
हुमायूं कबीर हाल ही में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के मॉडल पर बनाई गई एक मस्जिद को लेकर विवादों में आए थे। इसी विवाद के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें पार्टी नियमों की अवहेलना और लगातार विवादित बयानों के चलते निलंबित कर दिया था। अब नई पार्टी बनाकर कबीर ने टीएमसी से अलग अपनी सियासी राह तय करने का संकेत दे दिया है।
एक इंटरव्यू में हुमायूं कबीर ने बताया कि उनकी पार्टी राज्य की कुल 249 विधानसभा सीटों में से 135 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि जल्द ही पहले चरण में छह उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जाएंगे, जिनमें चार मुर्शिदाबाद और दो पश्चिम मेदिनीपुर जिले से होंगे। उनका दावा है कि जनता उन्नयन पार्टी आम आदमी की आवाज बनेगी और सभी वर्गों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के मुद्दों पर मजबूती से काम करेगी।
कबीर ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि अगर कोई मंदिर बनाता है तो उसे संवैधानिक करार दिया जाता है, लेकिन अगर मस्जिद बनाई जाती है तो उसे असंवैधानिक बताया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के दोहरे मापदंड देश की राजनीति में लगातार देखने को मिल रहे हैं।
टीएमसी और हुमायूं कबीर के बीच मतभेद उस समय और गहरे हो गए, जब छह दिसंबर को, बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी के दिन, कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के मॉडल पर नई मस्जिद की नींव रखी। इसके बाद पार्टी ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए निलंबन का फैसला लिया। निलंबन के बाद कबीर ने पहले विधायक पद से इस्तीफा देने के संकेत दिए थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना रुख बदलते हुए विधानसभा में बने रहने का फैसला किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हुमायूं कबीर की नई पार्टी राज्य की राजनीति में खासकर कुछ इलाकों में समीकरण बदल सकती है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता उन्नयन पार्टी कितनी मजबूत चुनौती पेश कर पाती है और इसका असर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस तथा विपक्षी दलों पर किस तरह पड़ता है।
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