तलाक-ए-हसन पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, पूछा– क्या सभ्य समाज में ऐसी प्रथा को जारी रहने दिया जाना चाहिए?
नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय की तलाक-ए-हसन प्रथा को संवैधानिक रूप से चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिया कि वह इस प्रथा को रद्द करने पर विचार कर सकता है। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा केवल एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है और यदि कोई प्रथा महिलाओं की गरिमा को आघात पहुंचाती है तो सुधारात्मक हस्तक्षेप आवश्यक है।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने तलाक-ए-हसन के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए। तलाक-ए-हसन में पति तीन महीने तक प्रत्येक माह एक बार तलाक कहकर विवाह समाप्त कर सकता है। अदालत ने कहा कि 2025 में ऐसे प्रावधानों को कैसे स्वीकार्य माना जा सकता है और क्या सभ्य समाज ऐसे तरीके को आगे बढ़ने की अनुमति दे सकता है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आवश्यक हुआ तो यह मामला पांच जजों की संविधान पीठ को भी भेजा जा सकता है।
अदालत ने दोनों पक्षों को अपने-अपने तर्कों और उठने वाले कानूनी प्रश्नों पर एक संक्षिप्त नोट देने को कहा। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि किसी प्रथा में स्पष्ट रूप से भेदभाव दिखता है तो न्यायालय का दायित्व है कि वह हस्तक्षेप करे, क्योंकि इस तरह के मामलों में हजारों महिलाएं आवाज नहीं उठा पातीं और चुपचाप सहती रहती हैं।
यह याचिका पत्रकार बेनजीर हीना द्वारा 2022 में दायर की गई थी, जिसमें तलाक-ए-हसन को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसके पति ने दहेज की मांग पूरी न होने पर वकील के माध्यम से तलाक-ए-हसन का नोटिस भेजकर तलाक दे दिया।
सुनवाई के दौरान पति की ओर से पेश अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने तर्क दिया कि तलाक-ए-हसन नोटिस भेजने के लिए प्रतिनिधि नियुक्त करना इस्लाम में मान्य और प्रचलित प्रथा है। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि पति सीधे पत्नी से संवाद क्यों नहीं कर सकता? उन्होंने कहा कि पत्रकार होने के कारण हीना अदालत तक पहुंच सकीं, लेकिन ऐसी स्थिति में कई महिलाएं आज भी बिना आवाज उठाए चुप्पी साधे बैठी रहती हैं।
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