‘जब खुद राष्ट्रपति ने राय मांगी तो दिक्कत क्या?’—सुप्रीम कोर्ट का सवाल, बिलों पर समयसीमा को लेकर सुनवाई जारी

फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। सबसे पहले अदालत यह तय करेगी कि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस संवैधानिक रूप से मान्य है या नहीं। उसके बाद ही यह बहस होगी कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल पर बिलों के लिए तय समयसीमा लागू की जा सकती है।

Aug 19, 2025 - 15:50
 0  189
‘जब खुद राष्ट्रपति ने राय मांगी तो दिक्कत क्या?’—सुप्रीम कोर्ट का सवाल, बिलों पर समयसीमा को लेकर सुनवाई जारी

नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट में आज एक अहम बहस शुरू हुई। मामला यह है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों पर बिलों पर हस्ताक्षर करने के लिए तय समयसीमा लागू की जा सकती है या नहीं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने खुद संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत यह सवाल सुप्रीम कोर्ट से पूछा है। लेकिन, विपक्ष-शासित तमिलनाडु और केरल सरकारें इस संदर्भ को ही चुनौती दे रही हैं। उनका कहना है कि यह संदर्भ असल में सरकार का है, राष्ट्रपति का नहीं, और पहले से दिए गए फैसलों को दोबारा खुलवाने की कोशिश है।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने शुरुआत में ही पूछा, 'जब खुद राष्ट्रपति ने राय मांगी है तो इसमें दिक्कत क्या है? क्या आप वाकई इसे चुनौती देना चाहते हैं?' बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत इस मामले में सलाहकारी अधिकार-क्षेत्र में बैठी है, यानी अभी यह कोई अंतिम आदेश नहीं बल्कि केवल राय देने की प्रक्रिया है।

मामला इसलिए उठा क्योंकि इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इस फैसले में कहा गया कि राज्यपाल किसी भी बिल पर जितनी जल्दी संभव हो कार्रवाई करेंगे। अगर राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला करना होगा। राज्यपाल के पास अपने विवेक से बिल रोकने का कोई अधिकार नहीं है; उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह माननी ही होगी। इसके बाद राष्ट्रपति ने 14 सवाल सुप्रीम कोर्ट से पूछे कि क्या अदालत तय समयसीमा तय कर सकती है और अनुच्छेद 200 व 201 की व्याख्या कैसे होगी।

केंद्र ने लिखित जवाब में कहा है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल पर समयसीमा तय करना संविधान में शक्ति विभाजन के खिलाफ होगा। ऐसा करने से एक अंग (न्यायपालिका) दूसरे अंग (कार्यपालिका) की शक्ति अपने हाथ में ले लेगा और संवैधानिक अव्यवस्था पैदा हो जाएगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल (केरल पक्ष से) ने कहा, अनुच्छेद 200 और राज्यपाल की भूमिका पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट कई फैसले दे चुका है। पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु के मामलों में कोर्ट ने साफ व्याख्या की है। जब फैसले मौजूद हैं तो फिर नया रेफरेंस स्वीकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति असल में मंत्रिपरिषद की सलाह से ही चलती हैं, इसलिए यह राष्ट्रपति का नहीं बल्कि केंद्र सरकार का रेफरेंस है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी (तमिलनाडु पक्ष से) ने दलील दी, उन्होंने कहा, 'यह असल में पुराने फैसले के खिलाफ एक तरह की अपील है, चाहे इसे कितनी भी खूबसूरती से पैक किया जाए।' सुप्रीम कोर्ट की अखंडता बनाए रखने के लिए इस तरह का रेफरेंस स्वीकार नहीं होना चाहिए।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि न्यायिक फैसला और सलाहकारी राय दोनों की प्रकृति अलग होती है। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहां डिवीजन बेंच के फैसले के बाद रेफरेंस नहीं लिया गया हो। इस बीच, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने केरल और तमिलनाडु की आपत्ति का विरोध किया और कहा कि यह रेफरेंस पूरी तरह वैध है।

सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में कहा था कि यह मुद्दा पूरे देश को प्रभावित करेगा। अगर समयसीमा तय होती है तो राज्यपाल और राष्ट्रपति को मजबूरी में तय दिनों में फैसला करना होगा। राज्यों का मानना है कि इससे केंद्र की तरफ से राज्यपालों के जरिए रोका गया कानून बनाने का काम आसान हो जाएगा।

Follow RNI News Channel on WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029VaBPp7rK5cD6X

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0
RNI News Reportage News International (RNI) is India's growing news website which is an digital platform to news, ideas and content based article. Destination where you can catch latest happenings from all over the globe Enhancing the strength of journalism independent and unbiased.