जज को हटाने की सिफारिश कर सकते हैं CJI: सुप्रीम कोर्ट ने कहा—सीजेआई सिर्फ डाकघर नहीं, न्यायपालिका के संरक्षक हैं
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, सीजेआई केवल डाकघर की तरह काम नहीं कर सकते। गंभीर कदाचार का मामला आने पर सीजेआई राष्ट्रपति को सिफारिश भेज सकते हैं। न्यायपालिका के संरक्षक के रूप में राष्ट्र के प्रति उनके कुछ कर्तव्य हैं। हम चुप रहकर केवल फैसला सुना सकते थे, लेकिन यह अन्याय होगा।
नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) साक्ष्यों की जांच करने के बाद यह पाते हैं कि किसी सेवारत न्यायाधीश के खिलाफ लगे आरोप गंभीर हैं तो वह उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश कर सकते हैं। घर से नकदी मिलने मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर शीर्ष कोर्ट ने कहा, आंतरिक जांच के आधार पर सीजेआई न्यायिक कार्यभार वापस ले सकते हैं।
पीठ ने कहा कि सीजेआई की सिफारिश को स्वीकार या अस्वीकार करने के मामले में संसद स्वतंत्र है। मौखिक तौर पर ये टिप्पणियां करते हुए शीर्ष कोर्ट ने याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, सीजेआई केवल डाकघर की तरह काम नहीं कर सकते। गंभीर कदाचार का मामला आने पर सीजेआई राष्ट्रपति को सिफारिश भेज सकते हैं। न्यायपालिका के संरक्षक के रूप में राष्ट्र के प्रति उनके कुछ कर्तव्य हैं। हम चुप रहकर केवल फैसला सुना सकते थे, लेकिन यह अन्याय होगा। याचिका में जस्टिस वर्मा ने दिल्ली स्थित उनके आवास से नकदी बरामद होने के संबंध में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर हटाने की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की वैधता को चुनौती दी है।
पीठ ने कहा, जस्टिस वर्मा के मामले में आंतरिक प्रक्रिया में किसी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ क्योंकि पिछले फैसलों के आधार पर यह अनुच्छेद 141 के अनुसार एक कानून है। पीठ ने आंतरिक प्रक्रिया में जज के भाग लेने और बाद में इसकी वैधता पर सवाल उठाने पर कहा कि यह आचरण विश्वास पैदा नहीं करता।
पीठ ने यह भी पूछा कि क्या संसद समिति की प्रक्रिया से कानूनी रूप से बाध्य है। पीठ ने कहा कि समिति हटाने की सलाह नहीं दे रही है, बल्कि कार्यवाही शुरू करने का सुझाव दे रही है। इसमें महत्वपूर्ण अंतर है। जस्टिस वर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, कार्यवाही दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर शुरू हुई थी।
पीठ ने कहा, प्रक्रियागत आपत्ति पहले उठाई जानी चाहिए थी : वरिष्ठ वकील सिब्बल ने कहा, उचित महाभियोग जांच में समिति जज को हटाने की सिफारिश से पहले जिरह सहित पूरी कार्यवाही करती है। इस जांच में वे सुरक्षा उपाय नहीं शामिल हैं। पीठ ने कहा कि यह प्रारंभिक तथ्य-खोज प्रक्रिया है। जिरह ऐसी कार्यवाही का हिस्सा नहीं है।
सिब्बल ने पूछा कि ऐसी प्रक्रिया महाभियोग की सिफारिश को कैसे उचित ठहरा सकती है। पीठ ने कहा, यह प्रक्रियागत आपत्ति पहले उठाई जानी चाहिए थी। न्यायाधीश संरक्षण अधिनियम की धारा 3(2) आंतरिक प्रक्रिया शुरू करने और जज से न्यायिक कार्य वापस लेने की अनुमति देती है।
घर से नकदी की बरामदगी मामले में आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, संसद स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इसकी अपनी शक्तियां हैं। क्या आपको लगता है कि संसद मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर कार्य करेगी?
जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि न्यायाधीश को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराया गया है। हालांकि, पीठ ने कहा कि न्यायाधीश को समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर मिला था और उन्हें संसद की समिति के समक्ष भी पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। सिब्बल ने संसद में मंत्रियों की न्यायाधीश के खिलाफ की गई टिप्पणियों का उल्लेख किया।
पीठ ने कहा, समिति के निष्कर्ष अस्थायी हैं और आगे की किसी भी कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगे। जब राजनेता या मंत्री बयान देते हैं, तो इस तरह के मामले में उनका कानूनी महत्व बहुत कम होता है।
सिब्बल ने तर्क दिया कि न्यायाधीश के पास आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती देने का कोई रास्ता नहीं है। हालांकि, अदालत ने कहा कि न्यायाधीश को पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी। पीठ ने कहा, दोष सिद्ध करने वाली रिपोर्टें पहले भी उपलब्ध थीं, लेकिन टेप लीक होने के बाद ही यह जरूरी हो गया।
सिब्बल ने जज को हटाने के लिए सीजेआई की ओर से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को की गई सिफारिश की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि आंतरिक प्रक्रिया के जरिये न्यायाधीशों को हटाने की कार्यवाही संविधान के अनुच्छेद 124 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि यह असामान्य है क्योंकि जस्टिस वर्मा के मामले में जांच शुरू करने से पहले कोई औपचारिक शिकायत नहीं की गई थी।
जले हुए नोटों के वीडियो के सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर खुलासे के संबंध में पीठ ने माना कि इस तरह टेप का लीक होना अनुचित था और ऐसा नहीं होना चाहिए था, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पूरी प्रक्रिया दूषित हो गई।
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