कोर्ट की निगरानी वाली कमेटी की मांग खारिज, हाईकोर्ट ने कहा— परीक्षण शुरू होने से पहले हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं
नई दिल्ली (आरएनआई)। दिल्ली हाईकोर्ट ने लाल किला विस्फोट मामले में अदालत की निगरानी में समिति गठित करने संबंधी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में यह मांग की गई थी कि मामले की रोजाना सुनवाई हो और मासिक प्रगति रिपोर्ट एक न्यायिक निकाय को सौंपते हुए पूरा परीक्षण छह महीने में समाप्त किया जाए।
बेंच ने याचिकाकर्ता की मांग को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल शुरू होने से पहले ही अदालत की निगरानी का अनुरोध पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने टिप्पणी की — “परीक्षण अभी शुरू भी नहीं हुआ है और आप चाहते हैं कि हम इसकी निगरानी करें? निगरानी तभी प्रासंगिक होती है जब कोई मामला वर्षों तक लंबित रहता है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को सिद्ध नहीं कर सका, जिससे पीआईएल के माध्यम से न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता साबित हो सके। अदालत ने इसे असाधारण हस्तक्षेप की मांग बताते हुए PIL पर सुनवाई जारी रखने से इनकार किया, जिसके बाद याचिका वापस ले ली गई।
याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अदालत की निगरानी से पीड़ित परिवारों को भरोसा मिलेगा। उन्होंने दलील दी कि कई आतंकवादी मामलों में फैसला आने में दशकों लग जाते हैं और लाल किला हमले के पूर्व ट्रायल को भी लंबा समय लगा था।
केंद्र का रुख
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि यह याचिका गलत तरीके से दायर की गई है। उन्होंने कहा कि जांच अब दिल्ली पुलिस की बजाय राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अधीन है और ट्रायल यूएपीए कानून के तहत होगा।
पंकज पुष्कर ने दायर की थी याचिका
यह जनहित याचिका पूर्व विधायक पंकज पुष्कर ने दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि लाल किला विस्फोट राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला था और पीड़ित परिवार “सत्य के अधिकार” से वंचित हैं, जो अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का हिस्सा है।
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