किम जोंग-उन ने दिखाई सामरिक ताकत, विशाल सैन्य परेड में नई ICBM का प्रदर्शन
सियोल (आरएनआई) उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी की स्थापना की 80वीं वर्षगांठ पर राजधानी प्योंगयांग में भव्य सैन्य परेड का आयोजन किया। इस दौरान देश की सामरिक शक्ति का भव्य प्रदर्शन किया गया, जिसने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा।
बारिश के बीच शुक्रवार रात शुरू हुई इस परेड में उत्तर कोरिया की नई पीढ़ी की सामरिक मिसाइलों और उन्नत हथियार प्रणालियों को प्रदर्शित किया गया। सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली हथियार प्रणाली “ह्वासोंग-20” नामक नई अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) रही, जिसे अब तक परीक्षण नहीं किया गया है। इसे उत्तर कोरिया ने अपनी “सबसे शक्तिशाली परमाणु रणनीतिक हथियार प्रणाली” बताया है। माना जा रहा है कि इस मिसाइल का परीक्षण आने वाले हफ्तों में किया जा सकता है।
परेड में कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें और सुपरसोनिक हथियार भी शामिल थे, जिन्हें पहले दक्षिण कोरिया पर संभावित परमाणु हमले के लिए सक्षम बताया गया था।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए के अनुसार, अपने संबोधन में किम जोंग-उन ने कहा कि देश की सेना को “एक अजेय शक्ति के रूप में विकसित होते रहना चाहिए, जो हर खतरे का समापन कर सके।” हालांकि उन्होंने अपने भाषण में अमेरिका या दक्षिण कोरिया का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया।
रूस की समाचार एजेंसी TASS द्वारा जारी तस्वीरों और वीडियो में किम इल सुंग स्क्वायर पर मिसाइलों से लैस वाहनों के गुजरते दृश्य और हजारों लोगों की मौजूदगी दिखाई गई। रिपोर्टों में बताया गया कि मार्च करने वाली टुकड़ियों में वे सैनिक भी शामिल थे, जिन्हें यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद के लिए भेजा गया था। इसे उत्तर कोरिया की विदेशी सैन्य संलिप्तता का संकेत माना जा रहा है।
यूक्रेन युद्ध के बाद से किम जोंग-उन ने रूस के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। माना जा रहा है कि उन्होंने रूस को बैलिस्टिक मिसाइलें, हथियारों की खेप और तोपखाने समेत सैनिक भी भेजे हैं। पिछले महीने किम ने चीन का दौरा किया था और एक सैन्य परेड के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ मुख्य मंच साझा किया था। इसे उनकी कूटनीतिक रणनीति के विस्तार की दिशा में बड़ा कदम माना गया।
इस परेड ने न केवल उत्तर कोरिया की सैन्य तत्परता को उजागर किया, बल्कि एशिया और पश्चिमी देशों के लिए संभावित रणनीतिक चुनौतियों का संकेत भी दिया।
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