“विवाह का इतिहास महिलाओं के नियंत्रण और दमन से जुड़ा रहा है” — सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत
नई दिल्ली (आरएनआई): सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इतिहास में विवाह को अक्सर महिलाओं पर नियंत्रण और दमन के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने यह टिप्पणी बुधवार को आयोजित एक सेमिनार— “क्रॉस-कल्चरल पर्सपेक्टिव्स: फैमिली लॉ में उभरते रुझान और चुनौतियाँ”—में की।
‘विवाह को साझेदारी के रूप में पुनर्परिभाषित करने की जरूरत’
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा: “यह एक असुविधाजनक सच्चाई है कि शादी को लंबे समय तक महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने के उपकरण के रूप में देखा गया। लेकिन सामाजिक और कानूनी सुधारों ने इसे समानता, गरिमा और परस्पर सम्मान पर आधारित साझेदारी की दिशा में बदला है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि विवाह अब केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि एक संवैधानिक मूल्य प्रणाली से जुड़ा विषय भी बन चुका है।
विदेशी तलाक डिक्री पर उठाया अहम मुद्दा
जस्टिस सूर्यकांत ने सीमा पार वैवाहिक विवादों और विदेशी कोर्ट द्वारा जारी तलाक डिक्री की मान्यता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के चलते ऐसे मामलों की जटिलता बढ़ रही है, क्योंकि कई दंपती अलग-अलग देशों में रह रहे होते हैं।
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी तलाक मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश स्थापित किए हैं, मगर दो स्थितियों में ऐसे फैसलों को भारत में मान्यता नहीं दी जाएगी—
यदि फैसला धोखाधड़ी से लिया गया हो
यदि वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो
बच्चों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता जरूरी
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब सीमा पार विवाह विवादों में बच्चे शामिल हों, तो अदालतों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा: “बच्चों के हित और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अधिकार क्षेत्र का सम्मान करते हुए मिलकर समाधान तलाशना आवश्यक है।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर भारत और इंग्लैंड जैसी न्याय प्रणालियां समान सोच रखती हैं।
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