सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में शौचालयों की बदतर स्थिति पर जताई नाराजगी, कहा- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
नई दिल्ली (आरएनआई) – सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के अदालत परिसरों में शौचालयों की खराब स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है। अदालतों में गंदगी, अस्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं की कमी मौलिक अधिकारों और न्यायिक गरिमा का उल्लंघन करती है। यह जानकारी विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में दी गई।
मेट्रो शहरों के उच्च न्यायालयों में भी शौचालयों की स्थिति खराब है, जो प्रशासनिक और वित्तीय असफलता का संकेत है।
सुविधाओं का सही रखरखाव न होना, बजट का उचित उपयोग न होना और जवाबदेही की कमी प्रमुख कारण हैं।
विकलांग लोगों के लिए रैंप, सहारा देने वाली बार और व्हीलचेयर की पर्याप्त जगह नहीं है।
तीसरे लिंग (ट्रांसजेंडर) के लिए जेंडर न्यूट्रल शौचालयों की कमी, महिला वकीलों और कर्मचारियों के लिए क्रेच/बच्चों की देखभाल की सुविधाओं की कमी गंभीर मुद्दे हैं।
उपसंचालन न्यायपालिका में स्थिति सबसे गंभीर है, स्थानीय जरूरतों के अनुसार बजट और निगरानी की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख:
रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अदालत परिसरों में सभी प्रकार के उपयोगकर्ताओं के लिए साफ-सुथरे और समावेशी शौचालय सुनिश्चित करने पर जोर दिया। कोर्ट ने पहले ही 15 जनवरी को निर्देश दिए थे कि राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश पुरुष, महिला, विकलांग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शौचालय उपलब्ध कराएं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन सुविधाओं की खराब स्थिति न्यायाधीशों, कर्मचारियों और वकीलों के स्वास्थ्य, दक्षता और न्यायिक गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यह रिपोर्ट वकील राजीब कलिता की पीआईएल के तहत प्रस्तुत की गई थी।
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