सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाएं बदलेंगी, सुप्रीम कोर्ट समिति की सिफारिश पर मुहर संभव
राजस्थान स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं में बदलाव की तैयारी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने टाइगर रिजर्व की सीमाओं के पुनर्गठन को मंजूरी देने की सिफारिश की है। हालांकि पर्यावरणविद इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे उन खनन गतिविधियों को फिर से कानूनी मंजूरी मिल सकती है, जिन्हें पहले सर्वोच्च अदालत ने रोक दिया था।
नई दिल्ली (आरएनआई) कमेटी ने अपनी 22 जुलाई, 2025 को सौंपी गई रिपोर्ट में बताया कि इस बदलाव का मकसद टाइगर ब्रीडिंग पैटर्न को ध्यान में रखते हुए संरक्षण को मजबूत करना है। नई योजना के तहत मुख्य टाइगर हैबिटेट को 881.11 वर्ग किलोमीटर से बढ़ाकर 924.49 वर्ग किलोमीटर किया गया है, जबकि बफर ज़ोन को घटाकर 203.20 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है। इससे रिजर्व का कुल क्षेत्रफल मामूली रूप से 1,127.68 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा।
रिपोर्ट में पांडुपोल हनुमान मंदिर तक तीर्थयात्रियों की आवाजाही और खनन से जुड़ी समस्याओं पर भी ध्यान दिया गया है। मंदिर तक निजी वाहनों की आवाजाही रोकने और इलेक्ट्रिक या सीएनजी बसें चलाने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा मंदिर परिसर में लकड़ी जलाकर भोजन बनाने पर रोक लगाने और एलपीजी व सोलर एनर्जी के उपयोग की सलाह दी गई है।
कुछ पर्यावरणविदों, पूर्व वन अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि सीमाएं बदलने के पीछे का असली उद्देश्य मार्बल और डोलोमाइट खनन को दोबारा शुरू करना है। हालांकि कमेटी ने स्पष्ट किया है कि किसी भी बदलाव से पहले वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी जरूरी होगी।
कमेटी का दावा है कि सीमाओं का पुनर्गठन वैज्ञानिक आंकड़ों जैसे कैमरा ट्रैप्स और टाइगर मूवमेंट पर आधारित है, जिससे जैविक संपर्क और संरक्षण मूल्य में वृद्धि होगी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस बदलाव से कोई भी गांव विस्थापित नहीं होगा और यह सिर्फ पारिस्थितिक कारणों पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह इस सिफारिश को जल्द मंजूरी दे ताकि लंबित खनन मामलों पर उचित फैसला लिया जा सके।
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