फ़ाइलों में दबा आविष्कार, जीएसटी के बोझ तले कराहता भारत
(शैलेन्द्र बिरानी)
नई दिल्ली (आरएनआई) यह भारत पूरी भारत-सरकार की हो रही है। संविधान के अनुसार इसके प्रमुख राष्ट्रपति हैं, न कि इनके अधीन काम करने वाले प्रधानमंत्री, संसद के सदस्य, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व किसी एक राज्य के मुख्यमंत्री व उसकी सरकार हो, राजनीतिक दल तो बहुत दूर की बात हैं।
भारत रत्न डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रपति पद पर रहते हुए फ़ाइल को बढ़ाएं, उसकी पावती रसीद पत्र के माध्यम से भेजें। डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए फ़ाइल को सरकारी प्रक्रिया में लगाएं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, कैबिनेट मंत्री शिवराज सिंह चौहान, भूतपूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान फ़ाइल की प्रक्रिया से सीधे जुड़ें व केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव पत्र लिखकर राष्ट्रपति को उनके पत्र को दुबारा भेज अंतिम फैसला लेने के लिए संवैधानिक कानून के तहत अधिकृत कर दें। केन्द्रीय सचिव पद का व्यक्ति कई केन्द्रीय मंत्रालयों, राज्यों के मंत्रालयों, केन्द्र व राज्य के विभागों के पत्रों को संकलित करके एक सामूहिक पत्र बना दे तब भी भारत-सरकार के प्रमुख राष्ट्रपति फैसला न लें और देश के खजाने को प्रतिवर्ष प्रारम्भिक जीएसटी से प्राप्त हुए धन से ज्यादा धन को ठोकर मार फ़ाइलों में घुमा रहे हैं, उसे आप क्या कहेंगे?
फ़ाइल घुमाने से समय बर्बादी ही नहीं बल्कि हर मिनट दो निर्दोष इंसानों की जान ले रहा हो तो उसे आप किस अपराध की श्रेणी में रखेंगे? यह अकूत धन जीएसटी लागू नहीं हुआ और देश के हर नागरिक पर कई गुना विदेशी कर्ज नहीं चढ़ा उससे पहले ही राष्ट्रपति के पास पहुंच गया हो, तब भी उसे ठोकर मारकर या फ़ाइल को दबाकर आम लोगों के मुंह के निवाले पर से जीएसटी वसूला जाए तो इसे आप किस घटिया से घटिया अपराध की श्रेणी में रखेंगे? अमेरिका ने अब भारतीय दवाइयों पर सौ फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया है, परन्तु इस नये पेटेंटेड मेडिकल उत्पाद पर यह प्रभावी नहीं है। उल्टा अमेरिका को ही यह पैसा अपनी जेब से भरना पड़ता है।
यह फ़ाइल कोई साधारण कागजों का बंडल नहीं जिस पर सारी प्रक्रिया व कथनों पर सरकारी प्रक्रिया पूरी करनी हो। भारत-सरकार का पेटेंट विभाग पूरी दुनिया का रिकॉर्ड जांचकर पेटेंट प्रमाण पत्र दे चुका होता है और करीब 370 वर्ष पुराने आधुनिक शल्य चिकित्सा विज्ञान में भारत के अग्रणी बनने की पुष्टि कर देने का प्रमाण हो।
संयुक्त राष्ट्र-संघ (26-07-2008), इंटरनेशनल रेड क्रॉस एंड क्रीसेंट सोसायटी (24-08-2011), द ग्लोबल फंड (20-06-2011), पावती मेल (E-mail Dated 13-05-2009 Time: 08:51 PM Official E-mail id: president(at)messages(dot)whitehouse(dot)gov) बराक ओबामा, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (06-08-2009), क्लिंटन फाउंडेशन (25-03-2009), वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की प्रतिक्रिया व सहयोग से सम्बंधित दस्तावेज भी फ़ाइल में लगे हों। दुनिया के हर हिस्से से चालीस से ज्यादा देशों की कंपनियों के करोड़ों-अरबों डॉलर में एडवांस ऑर्डर के पत्र व ईमेल उस फ़ाइल में लगे हों, तब भी भारत के राष्ट्रपति अंतिम फैसला न लें तो इसे आप क्या मानेंगे?
राष्ट्रपति को भेजे (Letter Reference No. P1/D/1908110208 Dated 19-08-2011) सभी दस्तावेजों व दुनिया के हर देश की आर्थिक आधार पर पूरा आकलन के समय 220 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बाजार का पूरा मोनोपॉली वाला व्यवसाय हो, जो अब ‘हर रोज इस्तेमाल करो और फेंक दो’ के कारण कई गुना बढ़ गया हो। इसके बाद समय-समय पर राष्ट्रपति को पत्र आज तक जा रहे हैं और लगातार किसी न किसी मंत्रालय में घूम रहे हैं। यदि इन सभी पत्रों के रेफ़रेंस नम्बर लिखूंगा तो आप कहेंगे कि यह गालियों-नुमा सीरीज़ बीच में क्यों शुरू करी हैं। भारत आज भी अपनी ज़रूरत का सिर्फ चालीस फ़ीसदी ही उत्पाद करता हो, तब पूरी दुनिया की मांग पूरी करने के लिए देश में पाँच हजार से ज्यादा कंपनियां खुलती हों व वर्तमान चल रही कंपनियां दस गुना बड़ी बन जाने की बात हो, तब भी पूरा सरकारी तंत्र चुप हो जाए। इससे बड़ी बात प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों नई नौकरियां निकलती हों। नई कंपनियां खुलने के लिए पैसों के साथ कई निवेशकों के पत्र हों, तब भी भारत-सरकार व उसके प्रमुख राष्ट्रपति अंतिम फैसला न लें तो इसे आप मानसिक गुलामी के साथ पूरी गुलामी के और ज्यादा क्या समझ सकते हैं?
भारतीय कानून के हिसाब से पेटेंट में आविष्कारक की हिस्सेदारी को आविष्कारक छोड़कर सिर्फ इतना मांगे कि वो अपने आविष्कार का काम आगे करता रहे व सामाजिक जीवन जी सके, तब भी भारत का पूरा सिस्टम कुछ न करे और पूरे मामले को सिर्फ फ़ाइल के रूप में एक टेबल से दूसरी टेबल पर घुमाता रहे तो इसे आप कौनसा लोकतंत्र कहेंगे? यह एक आविष्कार के उत्पाद की फ़ाइल थी, परन्तु यह प्रक्रिया हर क्षेत्र के आविष्कार में लगती तो भारत कब का विकसित हो गया होता। प्रधानमंत्री अब स्वदेशी उत्पाद अपनाने का भाषण दे रहे हैं, जबकि स्वदेशी तकनीक को फ़ाइलों में दबाकर खत्म कर दिया जाता है। जब तकनीक ही नहीं तो नया विश्वव्यापी उत्पाद भारत में बनेगा ही नहीं। दुनिया से तकनीक को पैसा देकर लाइसेंस पर लाकर बनाएं तो बात अलग है। जब पैसा देकर उत्पाद नहीं, तकनीक लाएं तब भी देशी कौन से ऐंगल से होगा?
श्रीलंका, बांग्लादेश व अब नेपाल में सत्ता परिवर्तन और जेन-ज़ेड के नाम पर भारत के लद्दाख में विरोध पूरे भारत वर्ष में लोगों को सोचने के लिए प्रेरित कर रहा है। फ्रांस, इटली जैसे देशों में लोगों का गुस्सा लोकतंत्र को अपडेट करने की दस्तक दे रहा है। यह फ़ाइल उसी अपडेट लोकतंत्र के प्रारूप को अपने कवर के साथ ले गई। इस पर आधारिक साइन के साथ राष्ट्रपति-सचिवालय की मोहर भी लगी है, जो पूरी तरह राष्ट्रपति को संबोधित व सील पैक थी व भारतीय डाक विभाग ने उन्हें ही सुपुर्द करने का दस्तावेज दिया हो।
हम न तो अनशन करेंगे और न कोई विरोध प्रदर्शन क्योंकि अच्छा व लंबा जीवन हमें अकेले को तो नहीं जीना है। धर्मगुरु सबको मरने के बाद स्वर्ग में भेज देंगे, परन्तु इन धर्मगुरुओं से ज्ञान पाने के लिए पहले जीवित रहना ज़रूरी है। नौकरी, पेशा, विकसित भारत, प्रभावी लोकतंत्र, वैश्विक स्तर पर राष्ट्र सम्मान हमें अकेले को ही तो नहीं चाहिए। दुनिया में सिर्फ हमें अकेले को ही नहीं जीना, बाकी सभी को भी जीना है—चाहे वो कुर्सी पर विराजमान लोग हों या कुर्सी बिना लोग हों। एड्स, हेपेटाइटिस, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, ईबोला, जीका, निपाह और कोरोना के बाद अब नये की डिटेल राष्ट्रपति को पहुँचा रखी है। आम लोगों को जीने व मरने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब राष्ट्रपति तय करेगी कि आपको कितना जीना है व कितना टैक्स भरना है। वैसे भी नये अर्थशास्त्र में टैक्स हिस्सेदारी के बराबर ही नहीं, उससे ज्यादा है।
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