CJI बोले— न्यायिक सक्रियता जरूरी, लेकिन यह न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए; हवाई किराए पर केंद्र से मांगा जवाब
नई दिल्ली (आरएनआई)। देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बी. आर. गवई ने सोमवार को न्यायपालिका की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में न्यायिक सक्रियता बनी रहना बेहद जरूरी है, लेकिन यह सक्रियता किसी भी परिस्थिति में न्यायिक दुस्साहस या न्यायिक आतंकवाद का रूप नहीं लेनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब भी विधायिका या कार्यपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल होती हैं, तब संविधान प्रदत्त शक्तियों के तहत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
सीजेआई इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एफ. आई. रिबेलो की किताब हमारे अधिकार: विधि, न्याय और संविधान पर निबंध के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जस्टिस रिबेलो ने अपने लेखन में न्यायिक सक्रियता के दायरे और सीमाओं को बहुत स्पष्टता से रेखांकित किया है और यह भी बताया है कि कानून और संविधान ने विविधताओं से भरे देश भारत को एकजुटता का मार्ग कैसे दिखाया है।
जस्टिस गवई ने कहा कि जस्टिस रिबेलो ने समकालीन न्यायिक चुनौतियों पर भी बेबाकी से लिखा है और कई संवेदनशील मुद्दों पर न्यायपालिका की जिम्मेदारियों को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि देश की न्यायिक व्यवस्था नागरिकों के अधिकारों की अंतिम संरक्षक है और जरूरत पड़ने पर अदालतों को आगे आना ही पड़ता है।
उधर सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ते हवाई किराए पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि कई रूट्स पर अत्यधिक किराए से यात्रियों पर असामान्य आर्थिक बोझ पड़ रहा है और इस विषय में केंद्र को स्पष्ट नीति और जवाबदेही प्रस्तुत करनी होगी।
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