सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘केस की सुनवाई उसी दिन नहीं होगी जब तक फांसी न हो’

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश ही आमतौर पर ऐसे मामलों की सुनवाई करते हैं। लेकिन इस समय सीजेआई बीआर गवई पांच जजों वाली संविधान पीठ की सुनवाई में व्यस्त हैं। ऐसे में परंपरा के मुताबिक, कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज यह जिम्मेदारी निभाएंगे।

Wednesday, September 24, 2025 - 14:23
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘केस की सुनवाई उसी दिन नहीं होगी जब तक फांसी न हो’

नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकांत ने बुधवार को कहा कि वे किसी मामले को उसी दिन लिस्ट करने (सुनवाई के लिए लगाने) का आदेश तभी देंगे, जब किसी की फांसी होने वाली हो। उन्होंने वकीलों से यह भी सवाल किया कि क्या कोई जजों की स्थिति, उनके काम के घंटे और नींद की कमी को समझता है। यह टिप्पणी तब आई जब एक वकील ने तुरंत सुनवाई की मांग की। जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ में जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह भी शामिल थे। यह पीठ उन मामलों की मेनशनिंग (यानी तुरंत सुनवाई के लिए अनुरोध) सुन रही थी।

सुनवाई के दौरान वकील शोभा गुप्ता ने जस्टिस सूर्यकांत के सामने एक मामला रखा। उन्होंने कहा कि राजस्थान में एक रिहायशी मकान की नीलामी आज ही होनी है, इसलिए इस केस को तुरंत सूचीबद्ध किया जाए। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'जब तक किसी की फांसी होने वाली न हो, मैं उसी दिन केस लिस्ट नहीं करूंगा। आप लोग जजों की स्थिति नहीं समझते। आपको अंदाजा भी है कि हम कितने घंटे काम करते हैं और हमें कितनी कम नींद मिलती है? जब तक किसी की आजादी दांव पर न हो, उसी दिन केस लिस्ट नहीं होगा।'

जब वकील ने आग्रह जारी रखा तो जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि नीलामी का नोटिस कब जारी हुआ था। इस पर शोभा गुप्ता ने बताया कि नोटिस पिछले हफ्ते ही जारी हुआ था और बकाया राशि का कुछ हिस्सा पहले ही जमा कर दिया गया है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इस मामले की तुरंत सुनवाई की उम्मीद न रखें और इसे अगले दो महीने तक सूचीबद्ध नहीं किया जाएगा। हालांकि, बाद में उन्होंने राहत देते हुए कोर्ट मास्टर को आदेश दिया कि इस केस को शुक्रवार को सूचीबद्ध किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में हर दिन बड़ी संख्या में वकील अपने मामलों को तुरंत सुनवाई के लिए पेश करते हैं। लेकिन कोर्ट का कामकाज पहले से ही बहुत व्यस्त होता है। जस्टिस सूर्यकांत के इस बयान ने यह साफ किया कि केवल अत्यंत गंभीर मामलों, जैसे किसी की फांसी या व्यक्तिगत आजादी का सवाल, में ही तत्काल सुनवाई होगी। उनका यह बयान जजों के काम के भारी बोझ और न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते दबाव को भी उजागर करता है।

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