“माँ: ममता, त्याग और उपेक्षा की मार्मिक कहानी” — वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक

May 10, 2026 - 11:17
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“माँ: ममता, त्याग और उपेक्षा की मार्मिक कहानी” — वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक

“माँ” — यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की सबसे पवित्र अनुभूति है। यह ऐसा संबोधन है, जिसमें ममता का अथाह सागर, त्याग की तपस्या, करुणा की गहराई और निस्वार्थ प्रेम की अनंत धारा समाहित होती है। संसार में मनुष्य का पहला परिचय यदि किसी से होता है, तो वह माँ ही होती है। जन्म से पहले नौ माह तक अपनी कोख में संतान को धारण करने वाली माँ जन्म के बाद भी जीवनभर उसकी खुशियों, सुरक्षा और भविष्य के लिए स्वयं को समर्पित कर देती है।

माँ केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं होती, बल्कि वह जीवन की प्रथम गुरु, संस्कारों की पाठशाला और भावनाओं की सबसे बड़ी शरणस्थली होती है। बच्चे की पहली मुस्कान, पहला शब्द, पहला कदम और जीवन की पहली सीख माँ की गोद में ही आकार लेती है। उसकी उँगली पकड़कर बच्चा चलना सीखता है और उसके स्नेहिल स्पर्श से जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का साहस प्राप्त करता है। माँ के आँचल में वह सुरक्षा होती है, जिसे पाने के बाद संसार का हर भय छोटा प्रतीत होने लगता है।

माँ का जीवन त्याग और समर्पण की जीवंत प्रतिमा है। वह स्वयं भूखी रहकर अपने बच्चों का पेट भरती है, अपनी इच्छाओं का त्याग कर उनकी आकांक्षाओं को पूरा करती है। बच्चे की बीमारी में रातभर जागना, उसके दुख में आँसू बहाना और उसकी खुशी में अपनी दुनिया खोज लेना — यही माँ की ममता की पहचान है। संसार में अनेक रिश्ते स्वार्थ से बंधे हो सकते हैं, लेकिन माँ का प्रेम निस्वार्थ और निष्कलंक होता है।

भारतीय संस्कृति में माँ को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। “मातृ देवो भव” का संदेश केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का सार है। इतिहास साक्षी है कि महान व्यक्तित्वों के निर्माण में उनकी माताओं की निर्णायक भूमिका रही है। छत्रपति शिवाजी की वीरता के पीछे माता जीजाबाई के संस्कार थे, महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के पीछे माता पुतलीबाई की शिक्षा थी, वहीं स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व में उनकी माँ के आदर्शों की झलक दिखाई देती है। इससे स्पष्ट होता है कि माँ केवल परिवार की नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की भी आधारशक्ति होती है।

किन्तु विडम्बना यह है कि आधुनिक युग में वही माँ, जिसने अपने बच्चों के लिए जीवनभर संघर्ष किया, वृद्धावस्था में उपेक्षा और अकेलेपन का जीवन जीने को विवश हो रही है। भौतिकवाद, व्यस्त जीवनशैली और रिश्तों में बढ़ती संवेदनहीनता ने पारिवारिक मूल्यों को कमजोर कर दिया है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और वृद्धाश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यह स्थिति केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का भी संकेत है।

वृद्धाश्रमों में रहने वाली अनेक माताओं की आँखों में आज भी अपने बच्चों के प्रति वही प्रेम दिखाई देता है, जिसने उन्हें जीवनभर मजबूत बनाए रखा। किसी माँ ने अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए अपने गहने तक बेच दिए, किसी ने स्वयं कठिनाइयाँ सहकर उनका भविष्य संवारा, लेकिन बुढ़ापे में वही माँ अपने ही बच्चों के बीच पराई हो गई। यह स्थिति समाज के लिए एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है कि क्या आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी संवेदनाएँ और संस्कार खोते जा रहे हैं?

हालाँकि समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी माँ को सर्वोच्च सम्मान देता है और उनकी सेवा को अपना धर्म मानता है। लेकिन केवल औपचारिक सम्मान या विशेष अवसरों पर प्रेम व्यक्त कर देना पर्याप्त नहीं है। माँ के प्रति सच्चा सम्मान तब होगा, जब उसे जीवन के हर पड़ाव पर अपनापन, सुरक्षा और सम्मान मिले।

माँ केवल व्यक्ति विशेष की नहीं होती, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का प्रतीक होती है। धरती को “धरती माँ” और राष्ट्र को “भारत माता” कहकर संबोधित करना इस बात का प्रमाण है कि “माँ” शब्द में पालन, संरक्षण और समर्पण की सबसे व्यापक भावना निहित है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि माँ जीवन का वह अमूल्य वरदान है, जिसके बिना संसार की कोई भी उपलब्धि पूर्ण नहीं हो सकती। वृद्धाश्रमों में बढ़ती माताओं की संख्या आधुनिक समाज के लिए एक चेतावनी है कि यदि रिश्तों की संवेदनाएँ समाप्त हो गईं, तो भौतिक प्रगति भी अर्थहीन हो जाएगी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह नैतिक और मानवीय कर्तव्य है कि वह अपनी माँ का सम्मान करे, उसकी भावनाओं को समझे और उसके त्याग के प्रति सदैव कृतज्ञ रहे। वास्तव में माँ के चरणों में ही जीवन का सच्चा सुख, शांति और स्वर्ग निहित है।

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Laxmi Kant Pathak Senior Journalist | State Secretary, U.P. Working Journalists Union (Regd.)